बुधवार, 20 जनवरी 2010

मेरे इस निर्णय का


प्यार की जमीन के अंतिम छोर ने


मुझे लौटते हुवे देखा


आकाश की ऊँचाईयों से


झुक आये बादलो के कोमल स्नेह ने


मुझे गले लगा कर बिदा किया


मुझे दुनिया मे लौटाने कों तैयार


लडखडाती पगडंडियों पर


छाये घने कोहरे


छटने लगे


मेरी उतरी हुवी देह की कमीज


मुझे पहनने लगी


मेरे जूतों ने मेरे पैरो कों


मेरे कोट ने मेरे तन कों


ओढ़ लिया


अब मुझे ..सशरीर का


इस भीड़ की दुनिया की


तन्हाई ने स्वागत किया


जंगल के के एकांत


उदगम से उतरते प्रपात


घाटियों पर बैठे छाव


नदी पर दूर से दिखाई देती


एक् अकेली नाव


सागौन और साल वृक्षों की


विस्तृत हरी बांह


खाईयों की गहरी आँख


इन सबका साथ छोड़


मुझे अपने समक्ष पाकर


शहर की सडको कों आश्चर्य हुवा


की


मै लौट आया हू


हां यह सच है की मै वापस आ गया हू


पर मुझे उस प्यार के अंतिम छोर पर


नदी के आँचल ने ...


बांधकर रख लिया है सुरक्षित


मै इस बार


इन चौराहों के बीच


एक् महानगर की तरह


घूमते हुवे


भूख और प्यास से


लापरवाह पत्थरो के भगवानो से


पग पग पर


अपमानित होने के लीये


....तैयार हू


मेरे इस निर्णय का


अखबारों ने स्वागत किया है



किशोर






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