बुधवार, 13 जनवरी 2010

आज का दिन

आज का दिन भी
सार्थक न हो पाया
पुरे दिन ने मुझसे कहा -
तुम्हें पाना नही
खोना था
बहना था
प्लेटफार्म पर ठहरना नही
टरेन सा पटरियों पर चलना था
फुटपाथ पर
पड़ी एक् पुरानी पत्रिका
मे छपी किसी अनाम कवि की
उस जानदार कविता कों ही पढ़ लेते
दूरियों से पूछकर
जानना चाहते हो
जन्म और मृत्यु के बीच
अपने जीवन का कितना है फासला
न रात अभिनय करती न मै
जैसे
लोग अकारण ...
झूठ नही बोलते
दुःख और अपमान नही सहते होंगे
प्लेट धोते हुवे बच्चे की उंगलिया
yu ही सफ़ेद नही हो जाते होंगे
कोई किसी कों चाहने
ऐसे ही नही लग जाता होगा
क्या तुम्हें लगता है सूरज मेरे साथ
रोज शहर धुमने आता है
निरर्थक लगाने का मतलब ही
जीवन मे कुछ अर्थ है

किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: