रविवार, 24 जनवरी 2010

तुम हो एक् शब्द विरह


तुमहो

एक शब्द .विरह

और

मै हू एक शब्द... मिलन

तुम आ जातीयदिहवा सीटहलती हुवीयू ही -

-समुद्र तट पर

तो

मै तुम्हारे स्वागत मेलहरों के फूलो सा

बिछ जाता रेत पर

और

तब -तुम हो उठती सिहर

या

फ़ीर

कभी ऋतुराज .... की बांहों मे

भरेसरसों के पीले फूलो सा -

होता आल्हादित

मृदु धूप सी

जब तुम आती

कोहरे के जल से निखर कर

परन्तु

ऐसा

हो नहीं पायातुम चली गयी दूर

रेल सी मुझे छूकरमै देखता रह गया तुम्हेंजाते

एक बोगी सा कटकर

अब रह गया हूँ अकेलासोचता हूँ

क्या करूंगाठंडी कांपती सूनी रातके

तनहा प्लेटफार्म सा -तनहा जीकर


किशोर

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