बुधवार, 27 जनवरी 2010

बिना चप्पलो के


बिना चप्पलो के

मेरे पाँव चल पढ़े


इसी तरह एक् दिन मुझे -

बिना देह के

घूमते हुवे


जंगल से लौटती हुवी पग्दंदियो ने

देख लिया


उस वक्त मै ...

बहुत खुश था

जब मेरी शादी शुदा

पुत्री की प्रसव पीड़ा की समाप्ती के उपरान्त

एक् शिशू का जन्म हुवा था


तब मेरे पैरो मे चप्पल नहीं थे


उस वक्त जब मैंने जाना था की

कविता ही सच है

और सच ही प्रेम है

और प्रेम ही ईश्वर है


और कविता कभी ख़त्म नही होती

नदी के मन के पास अन्नंत रेत है

रेत के मन मे बहुत लम्बी एक् नदी है

और न रेत नदी कों कभी सोख पाती है

और न नदी के हाथ -

रेत कों अपनी हथेलियों मे कभी समेट पाते है


इसलीये मै प्रसन्न था

क्योकी कविताओ का अंत नही था


इसलीये उस दिन मै

बिना अपनी देह पहने ही ...

जंगल की ओर निकल गया था


किशोर







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