रविवार, 31 जनवरी 2010

ध्यान मे ........



टूट जाता है


पहले


कांच सा -यह तन


फ़ीर


शब्दों के अक्षरों सा -


बिखर जाता है मन


तब -


रश्मियों के जल की लहरों के


पांवो सा -


धीरे धीरे चलकर


आता है महा एकांत



कभी दिखाते है


रेतो के कण


कभी बुलाती एक् -


लम्बी सुरंग


नदिया कहती मुड़कर


आ आ


मेरे संग चल


किरणों के हाथो उठ


मुझमे नही रह जाता


तब कुछ भी वजन


लौटना नही चाहता मय


एक् अंतहीन पथ सा लगता


वह आतंरिक जगत


लगता उड़ता रहू -


बादलो सा


शांत ठहरे से आच्छादित


उस अम्बर की उंगलियों के छोर कों धर


हजारो जलते दीपकों की रोशनी


से भर जाते


तब आनंद के वे सुखद पल


कभी आसुओ मे डूब जाते नयन


कभी पाकर -


फूलो का कोमल स्पर्श ॥


स्वत: मुस्कुराते मेरे अधर


निर्जन मे बहते निर्झर के स्वरों कों सुनते -


मुझ अदृश्य हुवी सत्ता के


कोहरे की देह के अंग अंग


वहा पर -


नही होते घर .न महल


न कोई नारी ,न नर


ध्यान की गहराई मे


तब मै बन जाता हू -


सुमनों की महक मे लापता एक् वन


बैगनी .नीला ...आसमानी ..हरा ..पीला


नारंगी ..लाल


रंगों की समवेत एक् अभिव्यक्ति


सा खिल जाता हूँ तब


अमन के सरोवर का


बन एक् श्वेत कमल


किशोर






कोई टिप्पणी नहीं: