गुरुवार, 14 जनवरी 2010

तुम और मै


तुम और मै


अपने अपने देह के घर से


अपने कपड़ो के पर्दों से


अपनी अपनी आँख के दरवाजो से -


बाहर निकल आये थे


टेबल पर रखी चाय के


कप से उड़ते हुवे गर्म भाप की तरह


पास पास बैठे हुवे थे


पास रखी हुवी किताबो के पन्ने


पंख से फद्फदा रहें थे


खिडकियों के पारदर्शी शीशे से झांक कर


आँगन के फूल हमें देख रहें थे


सीडियो की तरह पुरे घर ने


प्रसन्नता पूर्वक मेरा स्वागत किया था


प्रत्यक्ष रूप से


हमारी -सोफे पर पड़ी उंगलियों के मध्य


एक् इंच का फासला तो था ही


हमारी इस दूरी पर


दीवार पर टंगे


आईने की निगाहें टिकी हुवी थी


फ़ीर भी मै उसकी जीवन की सार्थकता के


बहुत नजदीक था


और वह मेरे मन के शब्दों कों अर्थ दे रही थी


लहरों की तरह ..हम


आपस मे मिल रहें थे


और


काल्पनिक समुद्र की महा चेतना की समझदारी मे


धर्म की आड़


जात-पात का बंधन


पारिवारिक अडचने


सब नमक की तरह पीस कर घुल गए थे


अब न मै पुरुष था


न वह एक् स्त्री


इस एकाकार प्रेम की अदृश्य कविता कों


किताबो के कोरे पन्ने पढ़ रहें थे


निश्चित ही हम दोनों की


यह पहली और आखरी मुलाक़ात थी


किशोर




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