बुधवार, 27 जनवरी 2010

तुम मेरे हर पल मे बसी याद हो ......


तुम ..हो ..

या

तुम्हारी ...तस्वीर हो ...

मेरे लीये -दोनों का अर्थ एक् ही है


तुम ...हो ..

या

मेरे मन मे ....

बसी तुम्हारी ...परछाई हो .........

मेरे लीये -दोनों मे कोई फर्क नही है


तुम्हें देखते ही

मै ।लिख .जाता हू

मानो तुम ॥मुझमे ...

और

मै ... तुममे ... मिल जाता हू


तुम्हारी आँखे ...

जहा तक मुझे देख पाती है

तुम्हारा मन ॥

जहा तक मुझे सोच पाता है


वही तक ...हू मै

मै चाहता हू की -

तुम मुझे देखती रहो

तुम मुझे सोचती रहो


और

मै ........आकाश से भी बड़ा

एक् स्वप्न बन कर तुम्हारी नीद मे आ जाऊ

और

मै ॥कभी न ख़त्म होने वाले

इस संसार की तरह तुम्हारे मन लायक

एक् कहानी बन जाऊ


ताकी

मै तुम्हें ....

तुम्हारे स्वप्न मे

देखता ही रहू

तुम्हारे ध्यान मे ...

साथ साथ तुम्हारे चलता ही रहू


मुझे लगता है मै तुम्हें लिखता ही रहू

और

तुम मुझे किताब सा -पढ़ती ही रहो

और

यह सिलसिला कभी समाप्त न हो

हम दोनों के अहसास के जीवन कों

फ़ीर जन्म और मृत्यु का आभास न हो

मेरी चेतना मे तुम्हारा

और

तुम्हारी चेतना मे मेरा

सदा बस वास हो ....


मै तुम्हें ...

भूल नही पातातुम मेरे हर पल मे ...

बसी .......याद हो


किशोर

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