रविवार, 24 जनवरी 2010

कोरे पन्ने पर


कोरे पन्ने पर

कलम सी तुम मुझे रोज लिखती हो

फ़ीर

एक किताब सा ॥

मुझे अपने हाथो मे थामकर

रोज पढ़ती हो

मेरी भटकती आस्था कों

किसी मन्दिर की सीढियों से

लौटाकर उसके चेहरे की थकान के पसीने कों

अपने आँचल से पोछती हो

मेरे सपनो की गहरी नींद से

मुझे जगाकर

अपनी नींद के सपनो के संग ले जाती हो

अपनी हथेली पर

खिची हुवी मेरी यादो की रेखाओं कों

अपनी मुठ्ठी मे खुश्बू की तरह

सुरक्षित रख लेती हो

दर्द के पहाडो के बीच से

तुम मुझे पगडंडी की तरह बचा लेती हो

पतवार की तरह

खेकर मेरे जीवन की नाव कों

पार लगा देती हो

संगमरमर के काल्पनिक पत्थरो पर

मै तुम्हारे हर रूप कों

उकेरने लगा हू

मेरे मन की आँखों से तुम भी देखो

तुम नदी हो

और मै ....

उसके जल मे घुले हुवे बादलो का

प्रतिक्षण बदलता हुवा .........

आकर्षक रंग हू


किशोर

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