शनिवार, 23 जनवरी 2010

भींगा आंचल


दूर है नदी का प्रेम से भींगा आँचल

और

मुझमे भी उतर आया है

उसे छूने की चाह लिया हुवा
एक् प्यासा बादल

लेकीन बीच मे
है रेत का एक् .....महा सागर

जीसे पार करना
मुझे .....लगता है इस जनम
मे ....
मेरे लीये नही है सरल

मेरी उच्च भावनाओं के पैरो कों
खीचते है
संसारकी ...कामनाओं के
शुष्क दलदल

मेरे हाथ ... सहारे के लीये बढ़तेहै
तब

होते है वे ...काँटों से भरे बबूलों की जड़ो पर... निर्भर

फ़ीर जितना ही होना चाहता हू मै अग्रसर

उतनी ही दूर लौटकर
पुकारते है मुझे ...तट पर के ऊँचे वृक्षों की
सीधी गरदन पर उगे ....
हरे हरे नारियल ...

अब तो जीवन की दिनचर्या हो या निशा के पहर

लगता है मुझे
मै हू मानो एक् गाँव की आश मे
आज का भटका हुवा आधुनिक शहर

पूछ लो ,मुझसे .........क्या कहती है ॥
मेरे मन की अंतिम सतह
भला मै जिऊँगा क्यों बेवजह ...........

दूर है नदी का प्रेम से भींगा आँचल
और मुझमे भी
उतर आया है उसे छूने की चाह लिया हुवा
एक् प्यासा बादल

किशोर

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