शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

क्योकि प्रेम


मै मील का पत्थर हू


मेरे सीने पर


मै चाहता था


हर बार -तुम्हें याद कर


एक् एक् कविता लिखता जाऊ



तुम कोहरे सा -


टहलती हुवी घाटियों मे


जब भी आना


उन्हें पढ़ लेना



मै तुम्हें कैसे बताऊ


की -


जन्म से मृत्यु के बीच


जीवन की सड़क की डायरी मे


-तुम्हें लिखकर


इस -दुनिया की घाटी के एकांत मे


अब


मील के पत्थरो से बने श्वेत पन्नो सा -


बिखरा हुवा हू



शिखर से मेरी निगाहों कों -


तुम्हारे आगमन का इन्तजार है


मंदीर की घंटियों के गूंजते स्वरों मे -


मेरी पुकार भी तुम्हारे लीये


शामिल रहती है


लेकीन -पुकार मुझसे जब पूछती है


की -


उसका नाम क्या है


तब


पहाडो पर अटके हुवे चट्टानों सा -


मेरे कंठ चुप रह जाते है


मै जिसकी उपासना करता हू


जिसकी प्राथना मे -


रोज मन्त्र सा छंद रचता हू


अदृश्य की तरह .....


उस


सदृश्य कों भी ......


ओझल पाटा हू


कही ऐसा न हो


मेरे प्रेम और मेरी भक्ति से ....


प्रभावित और प्रसन्न होकर


मेरे सम्मुख -निराकार प्रगट हो जाए


तब भी मै कहू ....वो तुम नही हो


जिसका की मुझे इन्तजार है


क्योको प्रेम ....


विरह के अंत क्षणों का ही दूसरा नाम है


किशोर


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