सोमवार, 25 जनवरी 2010

पानी मे भी प्यास है


आधी रात हो गयी है


मै सो नही पा रहा हू

भागते हुवे ट्रेन की -

एक् बोगी की एक् सीट की -

खुली हुवी खिडकी से -अँधेरे मे

घुली हुवी चन्द्रमा की रोशनी मुझे निहार रही है


सारे वृक्ष लगते है


मुझे छोड़ कर लौट रहें है


ठंठी हवा के झोके ...

कभी मेरे माथे कों ,कभी मेरे गालो कों सहला रहें है


धरती और आकाश ........


जहां पर मिलते से दिखायी दे रहें है -


वहा से दूरी मेरे पास आ कर मुझे


छू छूकर -बार बार ...चली जा ही है


कभी कभी पुल के नीचे से -


नदी के बहते जल कों स्पर्श कर


लौटी कर्कश आवाज के संकोच कों भी .....


मै सुन रहा हू


कम्बल से लिपटे हुवे लोग बेसुध सोये है


लेकीन आश्चर्य ॥?

लगातार बात किये जा रहें ...


अपने ही प्रतिरूप मै से ॥

मै चाहता हू वह चुप हो जाए वह भी सो जाए
मेरी हर बात पर समर्थन के बिना ....

मै चाहता हू ......निपट अकेला रह जाऊ


मानों मुझे कोई छान ले

मानों मुझे आकार कोई निचोड़ ले


मै मिश्रित किये जल से -अलग होकर दूध सा रह जाऊ

मै देह से अलग होकर -मन के आनंद का मात्र -रस रह जाऊ ....


लेकीन -

अपने इस छने हुवे अंतिम अस्तित्व के

आखरी टुकड़े मे भी -


मुझ प्यासे तट के -रेत के अन्नत कणों के ख्याल मे तुम -एक् नदी -तो बची रहती ही हो

और

यदी मै नदी होता हू तो उसे तट के बाहों के सहारे की जरूरत पड़ती ही है


चाहने पर भी हम अकेले हो ही नही सकते

पानी मे भी प्यास है



किशोर

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