बुधवार, 13 जनवरी 2010

तुम्हारा ही प्रतिरूप हू

देखना चाहते है
मुझे
तुम्हारे नयन

तुम्हारे जागरण के भी
ध्यान मे
मै करता हू विचरण

छूना चाहता है
मुझे
तुम्हारी कामनाओं का
शुभ आँचल


मै हू
तुम्हारी तन्हाई का
एक् चेहरा अनगढ़
हर बार यही लगता है
तुम्हें वही है यह
तुम्हारी कल्पना कों
मुझसे मिलकर
जिसकी तलाश थी
तुम्हें जीवन भर

लेकीन
मै तुम्हारा ही प्रतिरूप हू
जिससे तुम
बाते करती हो
हर -पल
अपने मन के कमरे मे
अकेली जाकर

किशोर


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