शनिवार, 16 जनवरी 2010

सपने


सपनो मे मुझे बादल



घेरते है

रेत ..मेरे पांवो मे धंस जाते है

नदी ...मुझमे

डूबती चली जाती है

रास्ते ..मुझ पर से चलने लगते है



लेकीन मै चाहता हू

हर रात

स्वप्न वही से आरम्भ हो

जहां पर वह मुझे

पिछली रात छोड़ गया था

पर ऐसा होता नही कभी

हर बार मुझे

नए सुरंगों से ...

नयी पटरियों सा -गुजरना ही पड़ता है

वो बादल था या किसी का आँचल

वो नदी थी या किसी का प्यार

वो रेत थी या किसी की देह

इस दुनिया की ही तरह

सपनो मे भी

सब कुछ अधूरा ही रह जाता ही

मेरे बहुत करीब आकर

पर्वत मुझे अकेला -

छोड़ जाता है

उन्हें भी उन्के सपने बुला लेते होंगे

मेरे सपनो मे वो रहते है

पर मै उन्के सपनो मे हू या नही ...

उनसे कैसे पुछू



कितना अच्छा होता

हम सभी

स्वप्न मे भी मिलते

और

मेरा स्वप्न -

तुम्हारे स्वप्न से पूछता ...

क्या मै तुम्हारे स्वप्न मे हू ॥



किशोर





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