शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

देखो आया निडर बसंत


कर आतंक का अंत
देखो आया निडर बसंत

सरहद पर गिरा बरफ
कहता है करो सहन
इस बार महंगाई की
तरह ही है बहुत ठण्ड

देखो आया निडर बसंत

मेहेंदी कहती सीख लो
रचना हथेलियों पर रंग
पुरे हो जायेंगे इस बरस
ठहरे हुवे से है जिनके सपन
रहो कलियाँ अब संवर
आयेंगे भ्रमर पीने श्रृंगार का रस

देखो आया निडर बसंत

ऊँचे हरे -ज्यादा हुवे यूकलिप्टस
बड़ा करो कहते
मनुष्य कों अपने मन का कद
कहता है पवन कम होगा
कुछ और -अहंकारियों का घमंड

देखो आया निडर बसंत

सरसों हो या पलाश के सुमन
अमराई मे गाती
कोयल का भी यही कथन
सब जान का जीवन हो सफल
संकिर्नाताओ मे फंस कर
न रह जाए -मानव धरम

देखो आया निडर बसंत

किशोर

मे फंस

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