गुरुवार, 14 जनवरी 2010

कविता मे सब सच है

सत्य मे कविता शामिल न हो
पर
कविता मे सब सत्य है

हर शब्द अक्षरश: सच है
कविता मे
तुम हो
मै हू
और ये दुनिया भी है
कविता मे कुछ भी छुटा नही है

जैसे
न मैंने तुम्हें
न तुमने मुझे ...
विस्मृत किया है कभी

भूल से भी तुमने मुझे
भूला नही है कभी
इसलीये
याद कर तुम्हें मै ॥
खिल जाता हू
चाँद सा उभर आता हू
हवा मुझसे लिपट कर
मुझमे
तुम्हारे देह की महक धुधाती है

पर्वतो के भी शीश झुक जाते है
मेरा प्रेम उन्हें
उनसे उंचा लगता है

जब मुझे
तुम्हारा प्यार
आकाश की स्लेट पर
इन्द्रधनुष की तरह लिख देगा

तब सावन की रिमझिम मे
भींगी हुवी हवा की उंगलिया
किसका नाम लिखू
इन रेखाओं पर

तब भी मेरे ओंठ चुप रहेंगे

क्योकि प्रेम
मौन के गमले मे
स्वत: अंकुरित
एक् तुलसी का पौधा है

और तुम्हारे नाम का स्मरण
उसकी पूजा है

सत्य मे कविता भले शामिल न हो
पर
कविता मे सब सच है

किशोर


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