बुधवार, 13 जनवरी 2010

उनकी छवियों कों

पंखे कों लगाव है छत से

घड़ी कों दीवार से

कालीन कों फर्श से

हरी दूब कों प्यार है आँगन से

कोट भी मुझे

है ..मुझे अपना समझ कर

है पहनता

लेकीन

मुझे इसका अहसास

नही हो पाटा

मन के वशीभूत

मै ...

रह जाता हूँ ॥

दिन सा भटकता

भूल जाया करता हू

की धरती भी करती है

सूरज की परिक्रमा

चाँद भी निहारता है

पृथ्वी की हर अड़ा

सितारों कों भी मै

एक् कण के तारे सा ...

दिखायी देता होउंगा सदा

मेरा जूता ,मेरी चप्पल ,मेरी कमीज

मेरा कालर ,मेरी तमीज

मेरी मै ,मै ..से

ऊब चुके है -

मुझे ऐसा है लगता

इस दुनिया की सबसे बड़ी खिड़की

जहां से क्षितिज है मुझे झांकता

इस दुनिया का सबसे बड़ा दरवाजा

जहां से

समूचा आकाश है मुझे ओढ़ता

वही से सूरज धूप बन मुझे

पढ़ता है

वही से बादल

कोहरा बन मुझे

है आ घेरता

इस सच कों मान कर

मै भी चाहता हू जीना

उनकी छवियों कों

मन के दर्पण मे

अब उतार कर

किशोर

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