मंगलवार, 5 जनवरी 2010

रोज सुबह खिलने के लीये

बहुत खेतो के उस पार
भोर की अरुणाई
के पश्चात
किरणे आती
दरशाने
धरती के दृश्यों का उपहार

घने पुराने बरगद की
शाखाओं पर सुप्त
मौन के पंछी जाग
उड़ने कों आतुर हुवे
कलरव कर ,पंख पसार

खम्बो के बीच खिचे हुवे तार
बैठा एक् पक्षी उस पर रहा टाक
शायद आ जाए
पाहून इस घर के द्वार

पाकर अपनी माँ का दुलार
बछड़े के माथे पर अंकित
तिलक चमक रहा
लीये रंग
जैसे
ममता के दूध की हो श्वेत धार

बिही सीताफल की
टहनियों से भरा -
आँगन महक रहा
ताजा खिले मोंग्रो से आज

मुनगे की छाँव की हथेलियों मे
नन्ही पत्तियों सा झरकर
व्यतीत होगा दिवस -
मेरे आसपास
घूमकर पूरा वृताकार

शाहर के कोलाहल से दूर
गूंज

रहा वक्त का आवागमन
बैलो के गले मे बंधी घंटियों के स्वरों सा
बन
फ़ीर मेरे मन का ग्रामीण एकांत

लग रहा मै भी
बैठा रहू
पकड़ -
मंदीर की सीडियो की बांह
घूरती रहें मुझे
सरोवर के जल की
परछाईयों की आँख

शाहर से लौटकर हो गया
मै ...पुनर्जीवित
इस अपरचित सी लग रही
दुनिया के पंकिल हलचल मे
मानो
रोज सुबह खिलने के लीये
बना होऊ
एक् कमल अमल गात

किशोर













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