रविवार, 31 जनवरी 2010

ध्यान मे ........



टूट जाता है


पहले


कांच सा -यह तन


फ़ीर


शब्दों के अक्षरों सा -


बिखर जाता है मन


तब -


रश्मियों के जल की लहरों के


पांवो सा -


धीरे धीरे चलकर


आता है महा एकांत



कभी दिखाते है


रेतो के कण


कभी बुलाती एक् -


लम्बी सुरंग


नदिया कहती मुड़कर


आ आ


मेरे संग चल


किरणों के हाथो उठ


मुझमे नही रह जाता


तब कुछ भी वजन


लौटना नही चाहता मय


एक् अंतहीन पथ सा लगता


वह आतंरिक जगत


लगता उड़ता रहू -


बादलो सा


शांत ठहरे से आच्छादित


उस अम्बर की उंगलियों के छोर कों धर


हजारो जलते दीपकों की रोशनी


से भर जाते


तब आनंद के वे सुखद पल


कभी आसुओ मे डूब जाते नयन


कभी पाकर -


फूलो का कोमल स्पर्श ॥


स्वत: मुस्कुराते मेरे अधर


निर्जन मे बहते निर्झर के स्वरों कों सुनते -


मुझ अदृश्य हुवी सत्ता के


कोहरे की देह के अंग अंग


वहा पर -


नही होते घर .न महल


न कोई नारी ,न नर


ध्यान की गहराई मे


तब मै बन जाता हू -


सुमनों की महक मे लापता एक् वन


बैगनी .नीला ...आसमानी ..हरा ..पीला


नारंगी ..लाल


रंगों की समवेत एक् अभिव्यक्ति


सा खिल जाता हूँ तब


अमन के सरोवर का


बन एक् श्वेत कमल


किशोर






बुधवार, 27 जनवरी 2010

बिना चप्पलो के


बिना चप्पलो के

मेरे पाँव चल पढ़े


इसी तरह एक् दिन मुझे -

बिना देह के

घूमते हुवे


जंगल से लौटती हुवी पग्दंदियो ने

देख लिया


उस वक्त मै ...

बहुत खुश था

जब मेरी शादी शुदा

पुत्री की प्रसव पीड़ा की समाप्ती के उपरान्त

एक् शिशू का जन्म हुवा था


तब मेरे पैरो मे चप्पल नहीं थे


उस वक्त जब मैंने जाना था की

कविता ही सच है

और सच ही प्रेम है

और प्रेम ही ईश्वर है


और कविता कभी ख़त्म नही होती

नदी के मन के पास अन्नंत रेत है

रेत के मन मे बहुत लम्बी एक् नदी है

और न रेत नदी कों कभी सोख पाती है

और न नदी के हाथ -

रेत कों अपनी हथेलियों मे कभी समेट पाते है


इसलीये मै प्रसन्न था

क्योकी कविताओ का अंत नही था


इसलीये उस दिन मै

बिना अपनी देह पहने ही ...

जंगल की ओर निकल गया था


किशोर







तुम मेरे हर पल मे बसी याद हो ......


तुम ..हो ..

या

तुम्हारी ...तस्वीर हो ...

मेरे लीये -दोनों का अर्थ एक् ही है


तुम ...हो ..

या

मेरे मन मे ....

बसी तुम्हारी ...परछाई हो .........

मेरे लीये -दोनों मे कोई फर्क नही है


तुम्हें देखते ही

मै ।लिख .जाता हू

मानो तुम ॥मुझमे ...

और

मै ... तुममे ... मिल जाता हू


तुम्हारी आँखे ...

जहा तक मुझे देख पाती है

तुम्हारा मन ॥

जहा तक मुझे सोच पाता है


वही तक ...हू मै

मै चाहता हू की -

तुम मुझे देखती रहो

तुम मुझे सोचती रहो


और

मै ........आकाश से भी बड़ा

एक् स्वप्न बन कर तुम्हारी नीद मे आ जाऊ

और

मै ॥कभी न ख़त्म होने वाले

इस संसार की तरह तुम्हारे मन लायक

एक् कहानी बन जाऊ


ताकी

मै तुम्हें ....

तुम्हारे स्वप्न मे

देखता ही रहू

तुम्हारे ध्यान मे ...

साथ साथ तुम्हारे चलता ही रहू


मुझे लगता है मै तुम्हें लिखता ही रहू

और

तुम मुझे किताब सा -पढ़ती ही रहो

और

यह सिलसिला कभी समाप्त न हो

हम दोनों के अहसास के जीवन कों

फ़ीर जन्म और मृत्यु का आभास न हो

मेरी चेतना मे तुम्हारा

और

तुम्हारी चेतना मे मेरा

सदा बस वास हो ....


मै तुम्हें ...

भूल नही पातातुम मेरे हर पल मे ...

बसी .......याद हो


किशोर

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

खुशी का मतलब है


खुशी का मतलब है


कोई मुझे चाहे


मेरा नाम जाने बिना


मुझे पुकारे


मुझे पहचानने का अर्थ है


की


वह जान जाए


की मेरी कविताओ मे


उसी का जिक्र है


मैंने अपने आपसे पूछा -


फ़ीर भी मै क्यों चाहता हू -


कि-


उसके सपनो मे बादलो की तरह udu


ret की तरह bichhu


नदी की तरह बहू


उसके सपने मे दिखाई देते


एक् अंतहीन सुरंग के डरावने अँधेरे मे


उसकी जगह मै ......लापता हो जाऊ


पहाड़ो से उतर कर आते


लावो की गर्म आंच मे


उसकी जगह ...मै पिघल जाऊ


और


वह घबरा कर नींद से जाग जाए


और


उसे महसूस हो कि -


उसने मुझे नही खोया है


जीवन की तरह वो भी एक् सपना था


किशोर


सोमवार, 25 जनवरी 2010

पानी मे भी प्यास है


आधी रात हो गयी है


मै सो नही पा रहा हू

भागते हुवे ट्रेन की -

एक् बोगी की एक् सीट की -

खुली हुवी खिडकी से -अँधेरे मे

घुली हुवी चन्द्रमा की रोशनी मुझे निहार रही है


सारे वृक्ष लगते है


मुझे छोड़ कर लौट रहें है


ठंठी हवा के झोके ...

कभी मेरे माथे कों ,कभी मेरे गालो कों सहला रहें है


धरती और आकाश ........


जहां पर मिलते से दिखायी दे रहें है -


वहा से दूरी मेरे पास आ कर मुझे


छू छूकर -बार बार ...चली जा ही है


कभी कभी पुल के नीचे से -


नदी के बहते जल कों स्पर्श कर


लौटी कर्कश आवाज के संकोच कों भी .....


मै सुन रहा हू


कम्बल से लिपटे हुवे लोग बेसुध सोये है


लेकीन आश्चर्य ॥?

लगातार बात किये जा रहें ...


अपने ही प्रतिरूप मै से ॥

मै चाहता हू वह चुप हो जाए वह भी सो जाए
मेरी हर बात पर समर्थन के बिना ....

मै चाहता हू ......निपट अकेला रह जाऊ


मानों मुझे कोई छान ले

मानों मुझे आकार कोई निचोड़ ले


मै मिश्रित किये जल से -अलग होकर दूध सा रह जाऊ

मै देह से अलग होकर -मन के आनंद का मात्र -रस रह जाऊ ....


लेकीन -

अपने इस छने हुवे अंतिम अस्तित्व के

आखरी टुकड़े मे भी -


मुझ प्यासे तट के -रेत के अन्नत कणों के ख्याल मे तुम -एक् नदी -तो बची रहती ही हो

और

यदी मै नदी होता हू तो उसे तट के बाहों के सहारे की जरूरत पड़ती ही है


चाहने पर भी हम अकेले हो ही नही सकते

पानी मे भी प्यास है



किशोर

उड़कर आ ही जाती हो


कुछ लोग भी रहते है मेरे ख्याल मे


हां तुम भी तो रहती हो


सत् आत्मा की एक् सुन्दर किताब की तरह मेरे समीप


आरती मे सुलग रहें अगरबत्तियों के महकते हुवे धुवे की तरह

उड़कर आ ही जाती हो ...

मेरी सांसो कों करने .....पुलकित

किशोर

रविवार, 24 जनवरी 2010

तुम हो एक् शब्द विरह


तुमहो

एक शब्द .विरह

और

मै हू एक शब्द... मिलन

तुम आ जातीयदिहवा सीटहलती हुवीयू ही -

-समुद्र तट पर

तो

मै तुम्हारे स्वागत मेलहरों के फूलो सा

बिछ जाता रेत पर

और

तब -तुम हो उठती सिहर

या

फ़ीर

कभी ऋतुराज .... की बांहों मे

भरेसरसों के पीले फूलो सा -

होता आल्हादित

मृदु धूप सी

जब तुम आती

कोहरे के जल से निखर कर

परन्तु

ऐसा

हो नहीं पायातुम चली गयी दूर

रेल सी मुझे छूकरमै देखता रह गया तुम्हेंजाते

एक बोगी सा कटकर

अब रह गया हूँ अकेलासोचता हूँ

क्या करूंगाठंडी कांपती सूनी रातके

तनहा प्लेटफार्म सा -तनहा जीकर


किशोर

कोरे पन्ने पर


कोरे पन्ने पर

कलम सी तुम मुझे रोज लिखती हो

फ़ीर

एक किताब सा ॥

मुझे अपने हाथो मे थामकर

रोज पढ़ती हो

मेरी भटकती आस्था कों

किसी मन्दिर की सीढियों से

लौटाकर उसके चेहरे की थकान के पसीने कों

अपने आँचल से पोछती हो

मेरे सपनो की गहरी नींद से

मुझे जगाकर

अपनी नींद के सपनो के संग ले जाती हो

अपनी हथेली पर

खिची हुवी मेरी यादो की रेखाओं कों

अपनी मुठ्ठी मे खुश्बू की तरह

सुरक्षित रख लेती हो

दर्द के पहाडो के बीच से

तुम मुझे पगडंडी की तरह बचा लेती हो

पतवार की तरह

खेकर मेरे जीवन की नाव कों

पार लगा देती हो

संगमरमर के काल्पनिक पत्थरो पर

मै तुम्हारे हर रूप कों

उकेरने लगा हू

मेरे मन की आँखों से तुम भी देखो

तुम नदी हो

और मै ....

उसके जल मे घुले हुवे बादलो का

प्रतिक्षण बदलता हुवा .........

आकर्षक रंग हू


किशोर

शनिवार, 23 जनवरी 2010

जब मैंने तुमसे पूछा


जब मैंने तुमसे पूछा -
क्या तुम भी मुझे चाहती हो
उसने कहा -हां
तब ऊसी क्षण

जमीन से ऊपर उठ गए मेरे पग
मुझे लगा -मेरी देह मे ..ऊग आये है पर
बादलो कों छोड़कर मुझपर

बरसने लगे इन्धनुष के सातों रंग
धूप से नहाने लगा -नदी का जल

किरणों कों बांधने लगी अपने छोर मे हर लहर
वृक्षों की फैली -॥शाखाओं के घोसलों के ...

तिनको की गठानों मे ..और मजबूत हुवे ...गठ -बंधन
पाकर मेरा संग

जिन्दगी मे मुस्कुराने लगे चटकीले सुमन
तुम्हारे कपोल की शर्मायी लालिमा ने ...दौड़कर

छू लिया मेरे हिरदय की तीव्र धड़कन
मुझे लगा मेरीचाह की मांग मे ।

भर दिए हो ॥
प्यार का सिंदूर
तुम्हारे अनुराग की उंगलियों ने ..! ... तुरंत

किशोर

भींगा आंचल


दूर है नदी का प्रेम से भींगा आँचल

और

मुझमे भी उतर आया है

उसे छूने की चाह लिया हुवा
एक् प्यासा बादल

लेकीन बीच मे
है रेत का एक् .....महा सागर

जीसे पार करना
मुझे .....लगता है इस जनम
मे ....
मेरे लीये नही है सरल

मेरी उच्च भावनाओं के पैरो कों
खीचते है
संसारकी ...कामनाओं के
शुष्क दलदल

मेरे हाथ ... सहारे के लीये बढ़तेहै
तब

होते है वे ...काँटों से भरे बबूलों की जड़ो पर... निर्भर

फ़ीर जितना ही होना चाहता हू मै अग्रसर

उतनी ही दूर लौटकर
पुकारते है मुझे ...तट पर के ऊँचे वृक्षों की
सीधी गरदन पर उगे ....
हरे हरे नारियल ...

अब तो जीवन की दिनचर्या हो या निशा के पहर

लगता है मुझे
मै हू मानो एक् गाँव की आश मे
आज का भटका हुवा आधुनिक शहर

पूछ लो ,मुझसे .........क्या कहती है ॥
मेरे मन की अंतिम सतह
भला मै जिऊँगा क्यों बेवजह ...........

दूर है नदी का प्रेम से भींगा आँचल
और मुझमे भी
उतर आया है उसे छूने की चाह लिया हुवा
एक् प्यासा बादल

किशोर

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

क्योकि प्रेम


मै मील का पत्थर हू


मेरे सीने पर


मै चाहता था


हर बार -तुम्हें याद कर


एक् एक् कविता लिखता जाऊ



तुम कोहरे सा -


टहलती हुवी घाटियों मे


जब भी आना


उन्हें पढ़ लेना



मै तुम्हें कैसे बताऊ


की -


जन्म से मृत्यु के बीच


जीवन की सड़क की डायरी मे


-तुम्हें लिखकर


इस -दुनिया की घाटी के एकांत मे


अब


मील के पत्थरो से बने श्वेत पन्नो सा -


बिखरा हुवा हू



शिखर से मेरी निगाहों कों -


तुम्हारे आगमन का इन्तजार है


मंदीर की घंटियों के गूंजते स्वरों मे -


मेरी पुकार भी तुम्हारे लीये


शामिल रहती है


लेकीन -पुकार मुझसे जब पूछती है


की -


उसका नाम क्या है


तब


पहाडो पर अटके हुवे चट्टानों सा -


मेरे कंठ चुप रह जाते है


मै जिसकी उपासना करता हू


जिसकी प्राथना मे -


रोज मन्त्र सा छंद रचता हू


अदृश्य की तरह .....


उस


सदृश्य कों भी ......


ओझल पाटा हू


कही ऐसा न हो


मेरे प्रेम और मेरी भक्ति से ....


प्रभावित और प्रसन्न होकर


मेरे सम्मुख -निराकार प्रगट हो जाए


तब भी मै कहू ....वो तुम नही हो


जिसका की मुझे इन्तजार है


क्योको प्रेम ....


विरह के अंत क्षणों का ही दूसरा नाम है


किशोर


बुधवार, 20 जनवरी 2010

मेरे इस निर्णय का


प्यार की जमीन के अंतिम छोर ने


मुझे लौटते हुवे देखा


आकाश की ऊँचाईयों से


झुक आये बादलो के कोमल स्नेह ने


मुझे गले लगा कर बिदा किया


मुझे दुनिया मे लौटाने कों तैयार


लडखडाती पगडंडियों पर


छाये घने कोहरे


छटने लगे


मेरी उतरी हुवी देह की कमीज


मुझे पहनने लगी


मेरे जूतों ने मेरे पैरो कों


मेरे कोट ने मेरे तन कों


ओढ़ लिया


अब मुझे ..सशरीर का


इस भीड़ की दुनिया की


तन्हाई ने स्वागत किया


जंगल के के एकांत


उदगम से उतरते प्रपात


घाटियों पर बैठे छाव


नदी पर दूर से दिखाई देती


एक् अकेली नाव


सागौन और साल वृक्षों की


विस्तृत हरी बांह


खाईयों की गहरी आँख


इन सबका साथ छोड़


मुझे अपने समक्ष पाकर


शहर की सडको कों आश्चर्य हुवा


की


मै लौट आया हू


हां यह सच है की मै वापस आ गया हू


पर मुझे उस प्यार के अंतिम छोर पर


नदी के आँचल ने ...


बांधकर रख लिया है सुरक्षित


मै इस बार


इन चौराहों के बीच


एक् महानगर की तरह


घूमते हुवे


भूख और प्यास से


लापरवाह पत्थरो के भगवानो से


पग पग पर


अपमानित होने के लीये


....तैयार हू


मेरे इस निर्णय का


अखबारों ने स्वागत किया है



किशोर







प्यार की जमीन के अंतिम छोर ने


मुझे लौटते हुवे देखा


आकाश की ऊँचाईयों se


jhuk aaye

बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर माँ सरस्वती कों प्रणाम


भारत वर्ष मे छ: ऋतू होते है

हर मौसम का अपना अलग अलग प्रभाव दिखायी पड़ता है

हर ऋतू की अपनी अलग अलग कहानिया है

वर्षा ,शरद ,ग्रीष्म ,शिशिर ,बसंत और हेमंत ऋतू

जनवरी के अंत से बसंत ऋतू की शुरुवात होती है ..माघ माह के

शुक्ल पक्ष के पाचवे दिन से बसंत कों मनाया जाता है


ज्ञान श्रेष्ठ होता है

माँ सरस्वती विद्या की देवी है

इस मौसम के जरिये माता बच्चो और बड़ो के मन मे

उल्लाहास भरती है


ऋतू राज बसंत भी उन्के चरण छूने ही इस धरती पर

हरी हरी पत्तियों और रंग -बिरंगे फूलो के साथ

अवतरित होते है


किसानो का मन खेतो की हरियाली देखकर प्रसन्न हो उठते है

बसंत पंचमी के दिन बसंत के आगमन का स्वागत ढोल नगाडो कों बजाकर

किया जाता है

लोग पीला वस्त्र धारण करते है

माँ सरस्वती की पूजा करते है

काव्य पाठ भी किया जाता है

होली का शुभ-आरम्भ भी इसी दिन से हो जाता है


होलिका दहन के लीये रोज लकडियो के संग्रहण की

शुरुवात बच्चे अपने अतिरिक्त समय मे करने लगते है

फाग गाने का अभ्यास गायक शुरू कर देते है ...

पलाश के फूलो से बच्चे घरो मे रंग भी बनाना सीख जाते है


खेतो मे सरसों का पीला फूल अपनी छटा बिखेर देता है

हवा ठंडी और नर्म होती है ..धुप सबको पिय लगती है

धरती अपनी प्रक्रति के सौन्दर्य सहित ..मन कों मोह लेती है


सरसों के पीले फूलो के वस्त्र कों लपेटी हुवी धरती नव वधू सी लगती है

कनेर के गुलाबी और पीले फूल उग आते है

सेमल के वृक्ष पर सूखे हुवे फूलो से कपास से रेशे उड़ने लगते है

गुलमोहर के चटक लालिमा लीये सुमन मुस्कुराने लगते है


दूर दूर खेतो मे और जंगल के एकांत मे पलाश पुष्पों

के केशरिया रंगों की आभा छा जाती है

मेरे गाँव की अमराई मे आम के पेड़ ..स्वर्णिम बौरो से भर जाते है


लगता है

माँ सरस्वती वीणा बजा रही है

और कोयल अपने मधुर स्वर से उनका साथ दे रही है


भँवरे भी फूलो के कणों मे मधूर गुंजन करने लगते है


पक्षी भी बसंत का सन्देश देने लगते है


आओ हम सब भी इस मौसम की मधुरता मे कहो कर

१-मीठा बोलना सीखे

२-प्रकृति के सौन्दर्य के रहस्य कों जाने

३-शांत और उल्लाहास के इस वातावरण मे .वड्या कों ग्रहण करना सीखे

और यही संकल्प लेते हुवे

बसंत का स्वागत प्रसन्नता पूर्वक करे

माँ सरस्वती कों प्रणाम करे


हर बरस तू आये बसंत

लेकर सुन्दर प्रकृती का उपहार

माँ देवी सरस्वती के हंस

सा सबके मन मे हो उज्वलता का प्रसार


*बरखा ग्यानी

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

नया मोड़


कहानी मे आया है
नया मोड़
नायिका ने कहा है
कहानी बहुत आगे बढ़ गयी है
हम दोनों कों छोड़

प्रेम -मय जीवन अंतहीन
एक् सुन्दर स्वप्न है
जिसमे ओर है न छोर
ऐसे हमारी प्रेम कहानी
सच्ची है
भला मानेगा कौन

जीवन के सूख और दुःख
जैसे किसान और मजदूर
फ़ीर रिक्शो के पहियों
और शहर के चौराहों
का अनसुना कर बोल
हम क्यों निकल आये है

इस पार के सूने मे इतनी दूर दौड़

अब मुझसे पूछ रहें -
ये बादल ये वृक्ष
यह नदी यह समुद्र
एक् बड़े प्रश्न सा -खड़े
पर्वत के संग
मेरे समक्ष होकर खामोश

लेकीन पौधे कहते है मुझसे
जब तक मुझमे
उगती रहेंगी नयी नयी पत्तिया रोज
जब तक
सरसों की हल्दी से
खेतो के अंग रहेंगे सराबोर

जब तक
आते रहेंगे हर बरस बसंत
और अमराई मे बौर

तब तक
इस प्रशन का उत्तर रहेगा
पलाश के खिले
गाढे रंग सा मौन

तब तक
प्रेम की पराकाष्टा
तक पहुचाने
उतरती रहेंगी किरणों की सीढिया
कल्पना के आकाश
और यथार्थ की धरती
के बीच बनकर भोर

ताकी यह कहानी
अंत मे
परिष्कृत हो जाए और
किशोर






रविवार, 17 जनवरी 2010

तुम हो मेरा सम्पूर्ण साक्षात अनुमान


तुम हो मेरा

सम्पूर्ण साक्षात अनुमान

मै करता हू अब ...
तुम्हारी पूजा
क्योकी तुम हो मेरा ज्ञान

अब न रहना दूर मुझसे ॥
न रखना मुझे
अपने से दूर दूजा जान

तुम ही मेरी सम्पूर्णता
खोज रहा था जीसे
अब तक
जग के वन वन मे
मै मान भगवान्

तुम ही हो सत् चित आनंद
मै करू तुम्हारा ...
तुम भी कर लो मेरा ध्यान

तुम ही ममता तुम ही मेरी मित्रता
खोया था जीसे पा लिया
अब चिर निरंतरता मे ...

नही रहा कोई व्यवधान


तुम तम राज से परे
सत् का हो गुणगान
तुम पृथ्वी ,अग्नि ,जल ,वायु ॥
कों धारण किये हुवे हो आकाश

तुम न मन हो ,न अहंकार
न मै पुरुष ,न तुम स्त्री
मै चेतन ...तुम चेतना
अब हुवे है एकाकार

मुझे धन्य कर गया
हे धन्या ...
तेरा मेरे लीये ...
यह निश्छल अगम अगोचर
के जैसा सात्विक अमर प्यार
तुम हो मेरा
सम्पूर्ण साक्षात अनुमान
किशोर

शनिवार, 16 जनवरी 2010

सपने


सपनो मे मुझे बादल



घेरते है

रेत ..मेरे पांवो मे धंस जाते है

नदी ...मुझमे

डूबती चली जाती है

रास्ते ..मुझ पर से चलने लगते है



लेकीन मै चाहता हू

हर रात

स्वप्न वही से आरम्भ हो

जहां पर वह मुझे

पिछली रात छोड़ गया था

पर ऐसा होता नही कभी

हर बार मुझे

नए सुरंगों से ...

नयी पटरियों सा -गुजरना ही पड़ता है

वो बादल था या किसी का आँचल

वो नदी थी या किसी का प्यार

वो रेत थी या किसी की देह

इस दुनिया की ही तरह

सपनो मे भी

सब कुछ अधूरा ही रह जाता ही

मेरे बहुत करीब आकर

पर्वत मुझे अकेला -

छोड़ जाता है

उन्हें भी उन्के सपने बुला लेते होंगे

मेरे सपनो मे वो रहते है

पर मै उन्के सपनो मे हू या नही ...

उनसे कैसे पुछू



कितना अच्छा होता

हम सभी

स्वप्न मे भी मिलते

और

मेरा स्वप्न -

तुम्हारे स्वप्न से पूछता ...

क्या मै तुम्हारे स्वप्न मे हू ॥



किशोर






सपनो मे मुझे बादल



घेरते है


रेत मेरे पांवो मे धंस jaat



शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

तुम्हारी परछाई से बनी है मेरी कल्पना


तुम्हारी परछाई से बनी है
मेरी कल्पना
तुम बोलती हो जो
वही होता है मेरा लिखना

इस बात कों तुम जानती हो
फ़ीर भी पूछती हो रोज
कहाँ से मिलती है मुझे
कविता रचने की प्रेरणा

तुम्हारी परछाई से बनी है मेरी कल्पना

तुमसे मिलने से पहले
अदृश्य था मेरे विचारों का चेहेरा
अब तुम सोचती हो
मुझे तो आता है बस
कागज पर शब्दों कों उतारना

तुम भानाओ के जल की हो वर्षा
मुझ तट के हिरदय के सागर का
काम है
उसे संभाल ,भरकर रखना

तुम्हारी परछाई से बनी है मेरी कल्पना

तुम्हारी कामनाओं की
लहरों की रस्सियों से
मेरे पाँव बंधे है
अब असंभव है मुझ तट का
तुम्हें छोड़कर ज़रा भी सरकना

जो इंतज़ार मे बिछा रहें सतत
उसे ही कहते है तट
इस बात से सब है अवगत
इस सच कों भी अब
तुम मत परखना

तुम्हारी परछाई से बनी है मेरी कल्पना

किशोर

देखो आया निडर बसंत


कर आतंक का अंत
देखो आया निडर बसंत

सरहद पर गिरा बरफ
कहता है करो सहन
इस बार महंगाई की
तरह ही है बहुत ठण्ड

देखो आया निडर बसंत

मेहेंदी कहती सीख लो
रचना हथेलियों पर रंग
पुरे हो जायेंगे इस बरस
ठहरे हुवे से है जिनके सपन
रहो कलियाँ अब संवर
आयेंगे भ्रमर पीने श्रृंगार का रस

देखो आया निडर बसंत

ऊँचे हरे -ज्यादा हुवे यूकलिप्टस
बड़ा करो कहते
मनुष्य कों अपने मन का कद
कहता है पवन कम होगा
कुछ और -अहंकारियों का घमंड

देखो आया निडर बसंत

सरसों हो या पलाश के सुमन
अमराई मे गाती
कोयल का भी यही कथन
सब जान का जीवन हो सफल
संकिर्नाताओ मे फंस कर
न रह जाए -मानव धरम

देखो आया निडर बसंत

किशोर

मे फंस

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

तुम और मै


तुम और मै


अपने अपने देह के घर से


अपने कपड़ो के पर्दों से


अपनी अपनी आँख के दरवाजो से -


बाहर निकल आये थे


टेबल पर रखी चाय के


कप से उड़ते हुवे गर्म भाप की तरह


पास पास बैठे हुवे थे


पास रखी हुवी किताबो के पन्ने


पंख से फद्फदा रहें थे


खिडकियों के पारदर्शी शीशे से झांक कर


आँगन के फूल हमें देख रहें थे


सीडियो की तरह पुरे घर ने


प्रसन्नता पूर्वक मेरा स्वागत किया था


प्रत्यक्ष रूप से


हमारी -सोफे पर पड़ी उंगलियों के मध्य


एक् इंच का फासला तो था ही


हमारी इस दूरी पर


दीवार पर टंगे


आईने की निगाहें टिकी हुवी थी


फ़ीर भी मै उसकी जीवन की सार्थकता के


बहुत नजदीक था


और वह मेरे मन के शब्दों कों अर्थ दे रही थी


लहरों की तरह ..हम


आपस मे मिल रहें थे


और


काल्पनिक समुद्र की महा चेतना की समझदारी मे


धर्म की आड़


जात-पात का बंधन


पारिवारिक अडचने


सब नमक की तरह पीस कर घुल गए थे


अब न मै पुरुष था


न वह एक् स्त्री


इस एकाकार प्रेम की अदृश्य कविता कों


किताबो के कोरे पन्ने पढ़ रहें थे


निश्चित ही हम दोनों की


यह पहली और आखरी मुलाक़ात थी


किशोर




कविता मे सब सच है

सत्य मे कविता शामिल न हो
पर
कविता मे सब सत्य है

हर शब्द अक्षरश: सच है
कविता मे
तुम हो
मै हू
और ये दुनिया भी है
कविता मे कुछ भी छुटा नही है

जैसे
न मैंने तुम्हें
न तुमने मुझे ...
विस्मृत किया है कभी

भूल से भी तुमने मुझे
भूला नही है कभी
इसलीये
याद कर तुम्हें मै ॥
खिल जाता हू
चाँद सा उभर आता हू
हवा मुझसे लिपट कर
मुझमे
तुम्हारे देह की महक धुधाती है

पर्वतो के भी शीश झुक जाते है
मेरा प्रेम उन्हें
उनसे उंचा लगता है

जब मुझे
तुम्हारा प्यार
आकाश की स्लेट पर
इन्द्रधनुष की तरह लिख देगा

तब सावन की रिमझिम मे
भींगी हुवी हवा की उंगलिया
किसका नाम लिखू
इन रेखाओं पर

तब भी मेरे ओंठ चुप रहेंगे

क्योकि प्रेम
मौन के गमले मे
स्वत: अंकुरित
एक् तुलसी का पौधा है

और तुम्हारे नाम का स्मरण
उसकी पूजा है

सत्य मे कविता भले शामिल न हो
पर
कविता मे सब सच है

किशोर


बुधवार, 13 जनवरी 2010

आज का दिन

आज का दिन भी
सार्थक न हो पाया
पुरे दिन ने मुझसे कहा -
तुम्हें पाना नही
खोना था
बहना था
प्लेटफार्म पर ठहरना नही
टरेन सा पटरियों पर चलना था
फुटपाथ पर
पड़ी एक् पुरानी पत्रिका
मे छपी किसी अनाम कवि की
उस जानदार कविता कों ही पढ़ लेते
दूरियों से पूछकर
जानना चाहते हो
जन्म और मृत्यु के बीच
अपने जीवन का कितना है फासला
न रात अभिनय करती न मै
जैसे
लोग अकारण ...
झूठ नही बोलते
दुःख और अपमान नही सहते होंगे
प्लेट धोते हुवे बच्चे की उंगलिया
yu ही सफ़ेद नही हो जाते होंगे
कोई किसी कों चाहने
ऐसे ही नही लग जाता होगा
क्या तुम्हें लगता है सूरज मेरे साथ
रोज शहर धुमने आता है
निरर्थक लगाने का मतलब ही
जीवन मे कुछ अर्थ है

किशोर

तुम्हारा ही प्रतिरूप हू

देखना चाहते है
मुझे
तुम्हारे नयन

तुम्हारे जागरण के भी
ध्यान मे
मै करता हू विचरण

छूना चाहता है
मुझे
तुम्हारी कामनाओं का
शुभ आँचल


मै हू
तुम्हारी तन्हाई का
एक् चेहरा अनगढ़
हर बार यही लगता है
तुम्हें वही है यह
तुम्हारी कल्पना कों
मुझसे मिलकर
जिसकी तलाश थी
तुम्हें जीवन भर

लेकीन
मै तुम्हारा ही प्रतिरूप हू
जिससे तुम
बाते करती हो
हर -पल
अपने मन के कमरे मे
अकेली जाकर

किशोर


उनकी छवियों कों

पंखे कों लगाव है छत से

घड़ी कों दीवार से

कालीन कों फर्श से

हरी दूब कों प्यार है आँगन से

कोट भी मुझे

है ..मुझे अपना समझ कर

है पहनता

लेकीन

मुझे इसका अहसास

नही हो पाटा

मन के वशीभूत

मै ...

रह जाता हूँ ॥

दिन सा भटकता

भूल जाया करता हू

की धरती भी करती है

सूरज की परिक्रमा

चाँद भी निहारता है

पृथ्वी की हर अड़ा

सितारों कों भी मै

एक् कण के तारे सा ...

दिखायी देता होउंगा सदा

मेरा जूता ,मेरी चप्पल ,मेरी कमीज

मेरा कालर ,मेरी तमीज

मेरी मै ,मै ..से

ऊब चुके है -

मुझे ऐसा है लगता

इस दुनिया की सबसे बड़ी खिड़की

जहां से क्षितिज है मुझे झांकता

इस दुनिया का सबसे बड़ा दरवाजा

जहां से

समूचा आकाश है मुझे ओढ़ता

वही से सूरज धूप बन मुझे

पढ़ता है

वही से बादल

कोहरा बन मुझे

है आ घेरता

इस सच कों मान कर

मै भी चाहता हू जीना

उनकी छवियों कों

मन के दर्पण मे

अब उतार कर

किशोर

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

हाँ ..मै हू एक् बालक का मन

हाँ मै हू ...
एक् बालक का मन
मेरे विचारों की उंगलियों कों ...
वृक्ष की टहनियों ...!
हमेशा पकडे रहना

माया के के झमेले मे
रेत के टीले सा -मुझे उठा
हवा उड़ा न दे कहीं

नदी अपने प्यार के
जल की नमी से
मुझे जकडे रहना

कभी पहाड़ से समुद्र कों
कभी समुद्र से पहाड़ कों
आश्चर्य से देखता हू
दोनों के बीच की ये दूरी -
मुझे भटका न दे कही

अरी ! पृथ्वी की धुरी
मुझे अपनी ममता की डोर से
बाँध कर रखना

मुझे चाहिए प्रकृति ...!
तुम्हारे दूबों की तरह उगे
हरे रंगों का कोमल स्पर्श

मुझे पता नही धन की आश मे
मनुष्य क्यों करते है
आपस मे संघर्ष

हे जिन्दगी ...!
मेरी भावनाओं के निर्झर कों
स्त्रोत सा -विशुद्ध ही रखना
उड़ानों कों देखकर
मै हू दंग ...
मेरे जीवन के रंग की
सुन्दर है पतंग

हे मेरी कल्पना ...!
उसे बस अपने हिरदय के
नीले आसमान मे ही
बस उड़ते रहने देना
मुझ अबोध का
अब तुम ही हो सर्वस्य
मै ही हू
तुम्हारे दिवस और तुम्हारी निशा
की आँखों मे बसा
एक् सच्चा स्वप्न

कल्पना ,तुम भी हो मेरे लीये
कहाँ किसी से कम
तुम हो कहानियो की परियो से
आयी हुवी एक् परी मेरे संग
हाँ ,मै हू एक् बालक सा मन

किशोर

पवित्र है उसका मन

नदी तुम
मंथर गति से बहती हो
कितनी सुन्दर लगती हो तब
लेकीन कभी
उग्र रूप धर
मुझ तट और मेरे प्रिय जनों कों
करती हो नष्ट
तब मै रह जाता हू ..हतप्रभ

तुम्हारी धारा जानती है बचना
मुझ तट की बांहों कों
नही आता लेकीन
उसे अपने बाहुपाश मे कसना

सागर है तुम्हारा स्वप्न
इसलीये
तुम्हें सुरक्षित पहुचाता हू मै
उस तक

तुम्हारे बिना ...प्यास लीये
बिछा रह जाता है
दूर दूर तक
मेरे इंतज़ार के क्षणों सा फैला
मेरा हर कण

नदी है
गति की गीता का
एक् मुक्त छंद
ज्ञान की जड़ता कों
सिखलाती है वह
तरल प्रेम का महा मन्त्र

पवित्र है उसका मन

गाँव हो या शहर
पर्वत हो या वन
सबको रखती है वह स्व्क्छ

वह माँ है
उदगम से समुद्र तक
उसकी इस लम्बी यात्रा मे
बनाना
हमें उसका रक्षक
यही नदी की पूजा होगी
हे मानव जरा समझ
किशोर


कहा जा पाओगे

विचारों के मन के आकाश के बादलो

की दीवारों से घिरे

धरती सा ...

आँगन के घर कों छोड़ को

कहा जा पाओगे

पूछता है मुझसे मेरी अंतर -आत्मा का मौन

फ़ीर आओगे लौट

किशोर

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

रोज सुबह खिलने के लीये

बहुत खेतो के उस पार
भोर की अरुणाई
के पश्चात
किरणे आती
दरशाने
धरती के दृश्यों का उपहार

घने पुराने बरगद की
शाखाओं पर सुप्त
मौन के पंछी जाग
उड़ने कों आतुर हुवे
कलरव कर ,पंख पसार

खम्बो के बीच खिचे हुवे तार
बैठा एक् पक्षी उस पर रहा टाक
शायद आ जाए
पाहून इस घर के द्वार

पाकर अपनी माँ का दुलार
बछड़े के माथे पर अंकित
तिलक चमक रहा
लीये रंग
जैसे
ममता के दूध की हो श्वेत धार

बिही सीताफल की
टहनियों से भरा -
आँगन महक रहा
ताजा खिले मोंग्रो से आज

मुनगे की छाँव की हथेलियों मे
नन्ही पत्तियों सा झरकर
व्यतीत होगा दिवस -
मेरे आसपास
घूमकर पूरा वृताकार

शाहर के कोलाहल से दूर
गूंज

रहा वक्त का आवागमन
बैलो के गले मे बंधी घंटियों के स्वरों सा
बन
फ़ीर मेरे मन का ग्रामीण एकांत

लग रहा मै भी
बैठा रहू
पकड़ -
मंदीर की सीडियो की बांह
घूरती रहें मुझे
सरोवर के जल की
परछाईयों की आँख

शाहर से लौटकर हो गया
मै ...पुनर्जीवित
इस अपरचित सी लग रही
दुनिया के पंकिल हलचल मे
मानो
रोज सुबह खिलने के लीये
बना होऊ
एक् कमल अमल गात

किशोर