शनिवार, 17 जुलाई 2010

मुझे नहीं हैं पसंद

अखबार की तरह
मुझे सभी लेते हैं पढ़

लेकिन तुम हो एक
सजिल्द किताब सी बंद

मेरे विषय में तो
हर किसी कों हैं खबर

लेकिन तुम बर्फ से ढकी
हुई हो -शिखर पर ....
मन्दिर की -एक स्वर्ण कलश

इसलिए
तुम्हारी प्रतिभाओं से हो कर
अनभिग्य -
मैंने भी अपनी कल्पना में
तुम्हारे बारे में -अनेकों kahaniyaan
ली हैं गढ़

मैं हर चबूतरे या चौराहे पर
लोगों से जात्ता हूँ मिल
सुनता हूँ -सब का दुःख
इसी लिये -तुम्हारे संग संग
पाया नहीं अब तक चल

तुम कहती हों मुझसे -
मुझे चलते रहना हैं संभल
अपनी देह की गगरी तक ही
रहती हूँ मैं -छलक

पर मैं कहता हूँ -
ठीक हैं हर कोई
अपनी देह की कमीज कों
पहन कर -
भीड़ के समुद्र की लहरों सा
अपनी अपनी राह में
रहा हैं मचल

लेकिन ..सामाजिक जीवन
पर्वत तो नही हैं .....जड़
की उसकी समस्याओं के दुर्ग
पर विजय की पताका फहराए
हर कोई अलग अलग

इसलिए
लोगों से मिलने से पूर्व
अपने चेहेरे पर -
और एक चेहरा लेती हो कयों मद
तुम्हारी यह aadat
मुझे नहीं हैं पसंद

किशोर

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

सौन्दर्य का सृजन



जल कहता हैं

मुझे मत छूना

सिहर कर मैं जाउंगा हिल

परछाई कहती

मत करना मेरा स्पर्श

भावावेश में हो उत्तेजित

मैं जाउंगी मिट

लगता हैं मैं हूँ मानों -

मनुज ..एक सीप

जो अपने सीने में -

पंखुरियों के सदृश्य

ह्रदय की भावनाओं से निर्मित

कल्पनाओं के रंगीन मोती कों -छिपाए हुए

रह जाता हैं -आखिर तक गरीब



मेरी कल्पना तुम नहीं हो कमीज

की -

जिसे मैं उतार कर

खूंटी पर टांग कर -कर जाऊ विस्मृत



तुमने तो मेरे -तन ,मन ,और आत्मा तक कों

रंगीन चूनरी सा ओढ़ रखा हैं

हे मेरी कल्पनातीत

इसलिए चाहता हूँ मैं -

कभी तुम जाओ मुझे

इस स्वप्न रूपी जग में

साकार रूप में मिल



लेकिन तुम कहती हों -मुझसे ...

मैं आईने के भीतर हूँ समाहित

मुझे बिम्ब समझो या ...

प्रतिबिम्ब

मतलब एक ही हैं -

ध्यान -मग्न यदी ..विचारोगे

होकर तल्लीन

मेरी सुन्दरता हैं ...

अनुपम और रमणीक

जिस दर्पण में मैं हुई हूँ -परावर्तीत

वह दर्पण भी हैं

असीम और अपरमीत



इसलिए हे कवि -

मैं कल्पना हूँ

चिर यौवना और शून्य में --कोहेरे सी विलीन

मैं स्वप्ना सी तुम्हें होते रहती हूँ

जागरण हो या नींद -

दोनों ही अवस्थाओं में आभासित

इसलिए मुझे यदी चाहोगे

अपने बाहूपाश में यदि भीचना

तो

चूर चूर हो जायेंगा संग

उसी क्षण -

दर्पण का भी अस्तित्व

फिर कैसे रचोगे

कल्पना में ...सौन्दर्य के उतुंग शिखर कों

हे कवि .......!

सृजनशील



kishor
copy on 14-08-13







सोमवार, 17 मई 2010

समर्थन अनुकूल



शहर के बीच


थी बहुत भीड़


लेकिन किसी व्यक्ति से


नही हो पायी मेरी बातचीत


अब मैं


बहुत दूर ...


नदी के साथ साथ चल रहा हूँ


लेकिन मेरे मन में भी हैं


एक गहरा समुद्र



जिसके लहरों के प्रश्नों के घाट -प्रतिघात से


निरुत्तर तट अब तक हैं अटूट


शहर हो ,जंगल हो , या ग्राम


हर जगह वृक्ष ,पर्वत


और जल ...सब हैं चुप


केवल जीविका उपार्जन के


लिये ही


बनता हैं सामाजिक -मनुष्य


शेष समय वह होता हैं


अकेला और मूक


लेकिन अंतत:


संसार के रेगिस्तान से छनकर


उड़ रहा बालू कण सा हैं महीन


मेरा रूप


या


मौन के जल का निथरा हुआ


हूँ एक बूंद


raajniti और आर्थिक निति


के अंतर्गत हैं मानव समूह


लेकिन


व्यक्तिगत परिप्रेक्ष्य में अपनी


निजता के अवबोध से हैं


हर मनुज व्याकुल


क्या ज्ञान के लिये जरुरी हैं


की


मैं जान लू व्यापक सिन्धु सम्पूर्ण


या


खंगालू अपने भीतर के


व्यक्तित्व में अकेले ही


आनंद का स्वरूप


लेकिन


इस उपलब्धि के लिये


आवाश्यक हैं


स्त्री मन और पुरुष मन में


परस्पर ..सौहाद्र पूर्ण ...


समर्थन अनुकूल



किशोर




रविवार, 2 मई 2010

प्रतिबिम्बों का झूठा समर्थन

दर्पण के मन के ॥कांच का हूँ मैं
एक अक्स
उस चेहेरे सा ही मेरा चेहेरा हैं
क्या सच ...?
कांच के भीतर परछाईयों से मुलाक़ात होती हैं
अकसर
और रिश्तों में गहराई का मुझे होता हैं
भरम
तोड़कर शीशे की दीवार बाहर नही पाता
उतर
खुद कों पहचानने के लिये जब भी खड़े होता हूँ
सबके समक्ष
निगाहों के शीशे मुंह फेर लेते हैं
उधर
हरेक के पास अपनी हैं
एक चमक
मुझे कौन पहचानेगा मैं तो हूँ अंधेरो से बना
एक तमस
लेकिन उन्हें पता नहीं काली पृष्ट -भूमी पर ही उभर कर आते हैं
श्वेत ॥दुधिया ..धवल रंग
लेकिन मेरे लापता इस व्यक्तित्व कों कैसे समझाऊ कि
सत्य कों जीने के लिये नही चाहिए
दर्पण में समाये
प्रतिरूपों कों अपनाए
प्रतिबिम्बों का -झूठा समर्थन
किशोर

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

शुधु केवल सुरे बाजे


आते एक संग हर्ष और विषाद



आते एक संग हर्ष और विषाद


उठते मन में राग और विराग


जैसे


काँटों कों देखो तो


दिखाई नहीं देते जीवन में


खिले अनेक गुलाब


आनंद में यदि व्यतीत हो काल


तो लगता क्षण भर के सपनों सा


हैं यह संसार


पर यदि अमावश आ जाए


तो लगता कितने लम्बी हैं


जीने कों उपलब्ध यह रात


पाने कों पद ,प्रतिष्ठा और ...


बनाए रखने अपनी साख


हम सब करते संघर्ष आजीवन


जिजीविषा कि यह ज्वाला भीषण


लेकिन


अनुराग की भूमिगत धारा एक


सतत बहती मन की जमीन के भीतर


मनुष्य उस प्यार या भक्ति कों


जानकर भी नहीं कर पाता अभिव्यक्त


हलाकि -


उस अनुराग का स्पर्श होता हैं


चन्दन के लेप सा शीतल


प्रेम एक भाव हैं जो रहता स्वयं तक सिमित


लेकिन प्रभाव से उसके


आकार हो


हो या निराकार


दोनों ही हो जाते आकर्षित


प्रेम कि अनुभूति कर चित्त कों


रहना हैं आनंदित


लेकिन -


भाग -दौड़ ..और प्रतिस्पर्धा


से घिरे मनुष्य कों


पल पल ....कर जाता दुखित


किशोर






मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

तुम मुझे सुन रही हो


क्या इस वक्त तुम मुझे सुन रहीं हो


या

मैं तुम्हें दीवार सा घूर रहा हूँ


क्या इस समय तुम मुझे पढ़ रहीं हों

या


मैं तुम्हें खिड़की के उस पार से निहार रहा हूँ


क्या तुम इस बार मन ही मन मेरा एक चित्र बना रहीं हो

या

मैं तुम्हारे समक्ष धूप की हथेली पर फूलों का रंग लिये खडा हूँ

क्या

तुम मुझसे कुछ कहना चाह रहीं हो

या

मैं तुम्हारे उस मौन कों लिख रहा हूँ


हम दोनों समान -अर्थी एक हीं शब्द हैं


तुम अगर समुद्र हो तो मैं उसमे भरा जल हूँ


तुम अगर अदृश्य हो तो मैं उसे साकार करने में रत मन हूँ


तुम अगर दृश्य हो तो मैं उसके सौन्दर्य कों आत्मसात करने के लिये बना दर्पण हूँ


किशोर

रविवार, 11 अप्रैल 2010

सात चित आनंद से परिपूर्ण

मैं लिखता हूँ कविता

और

तुम हो पढ़ती

दो आत्माओं के मध्य

हो रही केवल बातें हैं

सुन्दर और अच्छी

पहले पढ़ते थे लोग किताब

अकेले चुपचाप

अब मैं सुना रहा तुम्हें

स्वयं रच काव्य

मानो हो तुम श्रोता

सम्मुख मेरे -

आजकल कविता ..कवि से

यही शुभ काम करने के लिये तो हैं कहती

तुम भी प्रक्रति का ही हो अंग

fuul saa सुन्दर और

sukumaar तुम्हारी भी

चेतना का हैं रंग

तुम्हें मां एक आदर्श

मैं कर रहा अगर सृजन

तो इसमे क्या हैं हर्ज

मित्र यह हैं

सत चित्त आनंद से परिपूर्ण

एक सहज कर्म

किशोर

सोच रहा हूँ

पहाड़ की छत पर
तुम्हें याद करते हुए बैठे
सोच रहा हूँ

वह तुम्हारी मुझे निहारती आँखे हैं
या
कांच की कटोरी में
भरी हुई एक झील

वह चाँद हैं या चेहेरा
मुझे
डूबे हुवे बर्फ के एक टुकड़े सा
लग रहा हैं
मेरा ही प्रतिबिम्ब

पत्तीयों और बहती हवा के साथ
मैं भी तुम्हें याद कर
गुनगुना रहा हूँ एक गीत

जड़ो में नमी हैं
जड़ों की उंगलियाँ
जल से गयी हैं भींग

कुछ पीले पत्तों की
शरारती हथेकियों के छूटे ही
जल के दर्पण में
मेरा या चाँद का चेहरा
गया हैं हिल

मैं अब उतर रहा हूँ
सीढियां ...लेकिन

यह जाने बिना की
एकांत के मन का
कुछ पल के लिये ही सही
tuutaa हैं तन्मय दिल

मोंगरे की खिली पंखुरियों के सदृश्य
श्वेत रंग में लीन
शिखर पर -
एकाग्रचित हैं स्थित
वह शांत स्थिर
सौम्य मौन मन्दिर

किशोर




मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

हमारे चेहेरों की परछाईयाँ


तुम्हारे चेहेरे का प्रतिबिम्ब


सपनों की नदी में बहते हुवे मेरे सपनों के तट तक पहुंचता हैं


उस चेहेरे कों मैं अपनी हथेली में रख कर गौर से निहारता हूँ


बिंदियां में रंग सा खुद कों भरा पाता हूँ


सीप जैसे ...सुन्दर नयनों के भीतर स्वयं की तस्वीर कों जड़ा हुआ पाता हूँ


मुझे इतने समीप पाकर सपने में भी वह मुस्कुराने लगती हैं


और


उसके अधरों की दो पंखुरियां खिल जाती हैं


रेशम के धागों के सदृश्य उसके अलकों के महीन जाल में अपने ध्यान कों उलझा हुआ पाता हूँ


उस्के गालो का स्पर्श पाते ही मेरी उंगलियाँ फिसल सी जाती हैं


हम दोनों महसूस करते हैं


कि -


हमारे चेहेरों की परछाईयाँ इसी तरह रोज रात कों


एक दुसरे की हथेलियों पर सर रख कर सोती हैं


किशोर

रविवार, 4 अप्रैल 2010

फिर लौट आया प्यार का मौसम


फिर लौट आया प्यार का मौसम

अनुराग से भरी होगी शिकायत

दूर क्यों मुझसे रहते हो

जब नजदीक हैं हम

फिर लौट आया प्यार का मौसम


रजनीगन्धा सी महकेगी रात

जब मुझे आयेगी उसकी याद

चांदनी कों बुलाकर वह पूछेगी

सचमुच करते हैं क्या वे मेरा इंतज़ार

जान कर सच

तब बड़ जायेगी उसके ह्रदय की धड़कन

फिर लौट आया प्यार का मौसम


एक धुन गूंजती रहेगी

मन की अकुलाहट बाँसुरी सी बजती रहेगी

बार बार दुहराएंगे .........

सात जन्मो तक न अब बिछड़गें हम

फिर लौट आया प्यार का मौसम


किशोर

मुझे दिन काटते रहें


मुझे दिन काटते रहें

रातो के बिस्तर काँटों से चुभते रहें

नींद मुझसे कोसों दूर रही

दर्द के उजालो में मै अपनी ही किताब पढ़ता रहा

किसी की याद में भीतर ही भीतर दुःख की नदी में बहता रहा

फिर भी शेष रहा ....यह सोच कर कि -कभी तो किनारों के हाथ मुझे खीच लेंगे

और फिर...मेरे साथ सपने होंगे

साँझ और सुबह के सुनहरे पल होंगे

लहरों के पांवो के पायल में बजते हुवे नुपुर के मधूर स्वर होंगे

लेकिन इसे पाने के लिये मुझे रोते हुवे कोई न देखे

इसलीये मैं ज्यादा हँसने लगा

चेहेरे पर नया आवरण मढ़ने लगा

पर उसे मेरी वेदना का अहसास -हैं या नहीं

मुझे ज्ञात नहीं ...मेरे ओंठ कहते हैंहमने तो कह दिया हैं

तुम ही हो जिसकी हम पूजा करते हैं

अब सब्र करो

शांत रहो

विरह की इस पीड़ा कों सहो .......

किशोर

तीन ..मुक्तक

तुम वहीं हो बचपन की एक सजीव तस्वीर
जिसे मालूम हैं मैं उसी के रहता हूँ करीब
इतने साल लग गए पर कोई बात नहीं
वो तो थी ही मेरे पास
पर न था पास मेरे केवल उसके जिस्म का लिबास
अब हम रहेंगे साथ साथ
वह कविता हैं मेरी मै हूँ उसका कवि
वो सागर मैं नदी
कभी मैं तट
मेरी बांहों में वह बह चली
जियेंगे इसी तरह फिर न जाने कितनो सदी

किशोर


बचपन से थी बस यहीं चाह
कोई तो sune मेरे मन की बात
पर जिसे चाहूँ मैं और उसके सपनो के अनुरूप भी हौऊ
मैं कभी बचपन के खेलो कों कों करे याद
कभी यौवन के रंगीन बादलों पर हो सवार
और
उम्र की अंतिम घडियों तक banaa rahe yah अटूट प्यार
बस यही था ...
मेरी जिन्दगी का मकसद जो तुम मिल गए आज

किशोर


बहुत याद आयी उनकी दोस्ती
उनके शहर छोड़ जाने के बाद
फिर न कभी आया उनका ख़त
पर उन्हें हम भूल न पाए जीवन में सब पाने के बाद
लगता रहा कुछ खो गया हैं
हर चौराहे हर मोड़ पर एक हमदर्द साये सा उन्हें खडा पाया
आधी उम्र भी अपनी गुजर जाने के बाद

किशोर

आज दिल मेरा


आज दिल मेरा

देवता की आरती का बन गया दिया

कभी लगता हैं -वे ही मन्दिर हैं

और मैं हूँ उन तक पहुँचने के लिये -बनी सीडियां

पर उनकी ,.......

मुझसे नाराजगी का सबब बरसो बाद समझ आया

जब रुखसत के वक्त उन्होंने मुझे बताया

तेरी याद में इस तरह रहा खोया कि -

तुम्हें यह बात बताने का मुझे अवसर मिल न पाया

चाहा था कि

एक बार तेरी निगाहों के समंदर में ड़ूब जांऊ

पर मुझ मंझधार से किनारा इतना दूर था कि

तुझ तक कभी पहुँच न पाया


kishor

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

यही हैं एक सच


कैसे करू स्वयं कों अभिव्यक्त
तुम्हारे स्मरण की अमिट छाप हैं मेरे मन पर अंकित
और उसका प्रभाव भी हैं मुझ पर सशक्त
तुम्हारी दृष्टी के व्यापक कोण के आभास से घिरा रहता हैं मेरा सम्पूर्ण व्यक्तित्व
तुम्हारी घनी अलको का भूल नही पाता मैं सुखद स्पर्श
तुम्हारी सांसो के सुंगंधित हैं उच्छ्वास
तुम्हारी अधरों पर ठहरा पाता अपना नाम
तुम्हारे मस्तक की रेखाओं पर लिखा रहता हैं मेरे लिये चिंता का अहसास
यही हैं एक सच
जिसके आधार पर मैं सोचता -प्रवाहित हैं हर फूल पौधों और प्रकृति में यह प्राण
प्रेम की अनुभूति के बिना इस जग में कण कण बूंद बूंद जन जन कों देख असहाय
कैसे बहेगी मन में करुणा की धार
किशोर

वह खामोश थी


वह खामोश थी

हालांकि -उसे मालूम था सामने बैठा हुवा शख्स उससे बहुत प्रभावित हैं

वह उसके चित्र बनाता हैं और उसके हर भाव पर काव्य रचता हैं

बहुत देर बाद उसने मुझसे कहा -

हमसे बड़ी हमारी कवितायें हैं हमारी पेंटिंग्स हैं

मैंने महसूस किया कि -वह ठीक कह रही हैं

इस शांत और संयमित मुलाक़ात के बाद

मैं उसे अभिवादन कर बाहर आ गया

मुझे अब धूप में चमक कम लग रही थी

सूरज नदी से बहुत ऊँचाई पर था

फिर भी गमलो में खिले फूलों के रंग कुछ फीके लग रहें थे

ऐसे ॥ वह पास ही खडी थी मुझे आज के अंतिम नमस्कार के लिये

तभी मुझे याद आया ......

मैं उससे उसकी कविता नहीं सुन पाया हूँ

न ही वह लोरी जिसे मैं मन ही मन रोज रात सोने से पहले सुनता हूँ

और न ही मैं उसके आँचल के छोर से पानी से तर अपने ओंठो कों पोंछ पाया हूँ


शायद इस जन्म में मिला -उसके प्रेम के स्पर्श का एक शुभ अवसर ....

मेरे हाथ से फिसल चुका था

मैंने देखा फर्श पर बिखरे कांच के काल्पनिक टुकडो में हमारी आत्माए

हमारे इस संकोच पर एक साथ खडी हुवी मुस्कुरा रही थी


किशोर

सोमवार, 22 मार्च 2010

तम का होगा गहरा प्रकाश


जा दूर कही तू वियोग

आज हुवा हैं

मेरा मेरे प्रिय से संयोग

जगत -प्रतिस्पर्धा में

प्रथम रहने का मोह छोड़

मुझसे मिलने आये वे

यह मेरे लिये हैं

एक बहुमूल्य संजोग


प्रतिदिन करती हूँ मैं श्रृंगार

मन ही मन में

जारी रहता हैं उनका ध्यान

आंसूओ से भर जाती हैं आँख

आती हैं जब भी उनकी याद

लगता हैं इंतज़ार में उन्के

छूट न जाए मेरे प्राण


पदार्पण होते ही घर आँगन में

स्वागत हेतु खडी मिली हैं

उन्हें आज ,गृह के द्वार

मेरी मृदु मुस्कान

प्रेम में कुछ मिश्रित

यौवन का भी हैं ज्वार


उन्के नयनो के तीरों से

मैं वेदना ..बिंधना चाहती हूँ

सहृदय आर -पार

सूर्यास्त होते ही जब -

तम का होगा गहरा प्रकाश

तब देखेंगे

मौन मौन के दृष्टी कोण साश्चर्य

हमारे अन्तरंग प्रेम का सजीव उलास


किशोर



गुरुवार, 11 मार्च 2010

क्या यही प्यार हैं ...




जब उसने मेरी ओर ध्यान नही दिया


तो


मैंने भी उसे किसी का होने नही दिया


क्या यही प्यार हैं ...


उसे मेरी कविताओ से प्रेम था


और


मैं उस पर रोज एक कविता लिखता था


लेकिन


यह बात वह नही जानती थी


बहुत सालो बाद


जब मैं उससे मिला


तब तक वह मेरी कविताओ कों पढ़ते पढ़ते


मेरी कविताओ का शब्द बन गयी थी


मुझे मालूम था


वो मेरी आत्मा के अमृत से भर गयी थी


तब मैंने उससे कहा


मुझे आपसे मोहब्बत हैं


मैं आपका नाम लेते हीं -एक कविता लिख लेता हूँ


संसार के सारे फूलो की सुगंध में डूब जाता हूँ


मैं खुद चांदनी सा प्रकाश बन जाता हूँ


पर


उसके भी कुछ सिद्दांत थे


उसे बस ...मेरी कविताओ से मोहब्बत थी


kishor

शनिवार, 6 मार्च 2010

वह पाषाण नहीं इंसान थीं


मैंने उससे पूछा

तुम्हारे जीवन में नहीं ,लेकिन

क्या तुम्हारे सपनो में

आ सकता हूँ

उसने कहा -नहीं


तुम्हारे घर के दरवाजे मेरे लिये बंद हैं

मगर क्या मैं

रेल की तरह

तुम्हारे शहर से गुजर सकता हूँ

उसने कहा -नहीं

मेरे नाम और मेरे पते ने कहा -

हम भूलना चाहते हैं

इस शख्स कों ......

क्या अनुमति आपसे मिल जायेगी

उसने कहा नहीं


यहीं तो ईसकी सजा हैं

इसे न खुद कों भूलना हैं ..न ..मुझे

क्योकि -

इसने मुझसे प्यार करने का जुर्म

मेरी सहमती के बगैर कीया हैं


फिर मैं उसे भूलने के लिये

कभी -समुद्र के किनारे गर्म रेत पर

एक बूंद की तरह लेते गया

कभी -मेरा शरीर काँटों सा बिछ गया

कभी -मेरे पाँव अंगारों कों पार कर आये

कभी -फुटपाथ पर बिखरे खली दोनों सा

भूखा रह गया

कभी -मृत देह कों ले जाती भीड़ में शामिल हो

चिता तक चला गया

अंत में मुझे थका हुवा और पराजित जानकर

सीढियों ने मन्दिर के करीब बिठा लिया

और तब -

बजती हुवी घंटियों ने मुझसे पूछा -

आखिर तुम्हें हुवा क्या हैं

मैंने कहा -मैं जिसे भूलना चाहता हूँ

वही मुझे ज्यादा याद आ रही हैं

मैं अभिशप्त हूँ

चबूतरे की सारी प्रतिमाओं की आँखों से

एकाएक आंसू बहने लगे

वे नतमस्तक थे

मुझे प्यार करने का दंड मिल चूका था

मेरी व्यथा सुनकर पत्थरो में भी जान आ गयी थी

यह और बात हैं

उसे रसकी जानकारी नहीं थी

क्योकिं -

वह पाषाण नहीं ..इंसान थी

किशोर



शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

वह ...साकार



उसके असीम प्यार की


सीमा कों लांघकर


बहुत दूर निकल आया हूँ


ऐसा लगता हैं -


पहाड़ों के मजबूत हाथो ने


मुझे धकेल दिया हैं


और


समतल जमीन


नीचे की ओर धंसती जा रही हैं


मै हवा की बांहों मे हूँ


पर


मैं खुद हवा की देह कों छू नहीं पा रहा हूँ


काश ........


कल्पना के आकाश मे उड़ते


इन बादलो के पास -


कमरे होते


तो मैं वही रुक जाता


कुछ दिन


कुछ पल


यहाँ यही पर ठहर कर


पूरी उम्र व्यतीत कर लेता


मैं चाहता था ........


ऊपर उठना


पर


प्रेम के शिखर से ऊपर


पर्वतो के पास


और कुछ था भी नही


जहा से मैं और ऊँचाई तक चढ़ पाता


इसलीये


मुझे ......


प्रपात के करूं जल की तरह


उतरना तो था ही


अब मैं ..


बहती धारा की गोद मे समाहित हूँ


मुझसे सूख और दुःख के


किनारों ने कहा हैं -


अब तुम हमारे साथ साथ बहना


इस दुनिया मे इसे ही जीवन कहते हैं


कभी रेत पर बिखरे


पत्थरो के टुकडो पर


रेंग कर देखना


कभी बबूल के काँटों कों


छू कर देखना


कभी वन के वृक्षों की


हरी बातो कों सुनना


क्योकि -


सत्य .. सिर्फ ....


भाव है न आकार


दोनों से मिलकर होता हैं ...वह ..साकार


पैदल चलते करोडो मनुष्यों के


छालो के दर्द कों सहना


तब प्यार कों समझ आयेगा .........


की -


सचमुच .........


बिछी धूप की आंच


काँटों की चुभन


और .......


ऊँचाई पर स्थित प्रेम के स्वर्ण -कलश


के लिये .........


तुम्हारी आँखों मे भर आये अश्रु मे


कोई फर्क नही हैं


किशोर












छूती है मुझे




वक्त के पास

और

मेरे आसपास

छूती है मुझे -

पर कितनी अजनबी हैं

मुझ तक पहुंचती हर सांस


मुझे आखिर मे रखो

या

सर्व प्रथम

लेकिन चलो तो सही

मेरे साथ साथ


मैं कहता नहीं

मैं तो बहता हूँ लेकिन

तुम किनारे पर बैठ कर

क्यों

पढ़ रहे हो सिर्फ किताब




हर वस्तु

व्यक्ति ॥

या वातावरण कों

मै ॥

आऊ चाहे न आऊ न रास
पर

मुझे तो कहना है

हरेक से सचमुच सच सच बात


वक्त के पास

और

मेरे आसपास

छूती है मुझे -

पर कितनी अजनबी है

मुझ तक पहुंचती हर सांस


किशोर

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

शर्त

रेल से उतरते ही
मुझे
अहसास हुवा
अब भी
मै तनहा
नही रह पाया हू

मेरे पास ...
मेरी उंगलियों कों थमा हुवा एक बैग था

उस बैग मे
कुछ कोरे
कुछ भरे ....
पन्ने थे ............
मैंने उसमे अपने कपड़ो की तरह
अपनी देह कों भी -
ठूंस ठूंस कर
भरना चाहा था

पर उस बैग मे ...........

उतनी जगह नही थी

उसने कहा था ..आप हो कवि
और मै

रोज शब्दों का दान आपको कर सकती नही
मैफिर
एक लम्बी यात्रा पर निकल पडा था

लेकिन

हर खतरनाक मोड़ पर भी
मै बचता गया

इसका मुझे काफी दुःख था .........

अब भी मेरे समक्ष
लोगो से बने समुद्र
और
मेरे बीच ....रेत ही रेत है
पर मेरे पास तुम्हारे कहें हुवे शब्द नही है

मै इस महा पृष्ट पर
अब कैसे लिखू कविता

और वह यही शर्त दुहराती है
की
मुझसे प्रेम करने के लिये
कोई शर्त न हो

किशोर

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

निहारते रहना चाहता हू

तुम्हारे हिरदय के
कोमल अहसासों से बनी
घाटियों से
एक् प्यार की नदी
उतरकर
मुझ तक पहुचती है

और

भावनाओं से भींगे
रेत के समतल तट पर
हरे हरे
नन्हे पौधों के सदृश्य
मै ......
ऊग आता हू


तुममे व्याप्त
दर्दयुक्त ...
जल की प्यास बुझाने के लिये
मेरी जड़ो से निसृत
मिश्री कणों से निर्मित
शब्दों से -सृजित ...
कविता की तरह
तुम्हारी आँखों की तरल नमकीन देह में
मै
विलय हो जाना चाहता हू

हालाकि -
सुविचारो के घुमड़ते श्वेत बादलो की तरह
तुम्हारे समीप से भी
मै
गुजरता हू

पर
तुम्हारे मन के घर की
एकाग्रचित
खिडकिया ध्यानमग्न है
इसलिए -

तुम मुझे न देख पाती हो
न मेरे पांवो की
धीमी आहात को
सुन पाती हो

और .......

मै भी तुम्हे
सुकून के छत पर
सुखद समीर के संग
बैठे रहने देना चाहता हू

तुम्हे बिना छुए
तुम्हे बिना जगाये ........

तुम्हे एक् खूबसूरत
सजीव
प्रतिमा की तरह
बस .......

निहारते रहना चाहता हू

किशोर


प्रेम मे कुछ भी न करना निश्चित

वह कहती है
प्रेम मे कुछ भी न करना निश्चित
न मिलने का वक्त
न बिछड़ने का समय
जैसे
हम जीते है वर्तमान कों
यह जाने बिना कि -
अगले पल मे
हमारे जीवन का क्या है भविष्य
सचमुच चाहते हो मुझे
तो प्रेम मे भी
न ले आना -नियम और शर्तो की
फिर बेड़िया मेरे मीत
चाहती हू मै तुम्हें पूरा
लेकिन कितना चाहते हो यह पूछकर
मुझसे
प्यार कों मत कर देना सीमित
स्वप्न मे भी आना
पर
आकरयह न कहना ॥
बस यही रह जाओ
जागरण मे तुम्हारा
अविरल स्मरण भी तो मुझे है स्वीकृत
जीवन है तब तक ही होता है
प्रेम यह विचार अपूर्णता पर है आधारित
मृत्यु के पश्चात भी प्रेम ही शेष रहता है
मुझे हर हाल मे याद करना
संयोग और वियोग कि
परिस्थितियों से हुवे बिना प्रभावित
इसलीये अब मै नहीं होता उसके व्यवहार से अचंभित

तुम्हें देख सम्मुख
कुछ पल के लिये सब भूल जाता हू
खुद से हो पराजित
लेकिन तुम्हें बिदा कर याद मे
फिर तुम्हारे
खुद कों खोकर फिर हो जाता हू
मै पुनर्जीवित
इसीलिए वह कहती है
कुछ भी मन मे न कर
लेना निश्चित

किशोर

आँखे होती जाती है

वृक्ष की डाल से उतरती है
एक् गिलहरी
शीर्ष के छोर पर बैठा हुवा है
एक् पंछी
आकाश पर टहलते
बादलो की आँखों मे
धरती की अनेक तस्वीरे
है उभरी
जड़ो के पास पहुचते ही
थकी हुवी धूप की -शांत हुवी है
साँसे उखड़ी
नदी के जल कों
अपनी अंजुरी मे
भर बालूओ पर
बिछी आग कों बुझाने
हवा ने बिखेरी है दूर तक
शीतल बूंदों की लड़ी
शुष्क पत्तो की वर्षा के
मर्मर स्वर कों सुन कर
मौन के घर की खिडकिया
है सहमी
वन के एकांत कों लग रहा -
इन सब सजीव दृश्यों का
वह कब तक बना रहेगा एक् मात्र
मूक प्रहरी
मुझसे कहती है
शाखाओं पर छायी ...पत्तियों की
सुन्दरता हरी
सच के आवरण कों
बस
देखता है हम सबका बाह्य अवलोकन
पास जाने पर
सच की नदी की सतह की
आँखे होती जाती है -
बहुत सुन्दर
और
और गहरी

किशोर

हमेशा के लिये

मुझे मेरी डायरी ने
याद किया होगा
उस कोरे पन्ने ने

जिस पर मै
shaayad

एक कविता लिखा होता
अपनी बारी के इन्तजार मे
मुझे कोस रहा होगा

लिखते लिखते थक चुकी पेन की नीब

अब
आराम करते करते थक चुकी होगी

मेरी कुर्सी में
मेरी जगह पर किसी को न पाकर
मेरा कमरा ऊब चुका होगा

इन सबको पता नहीं की मै
अब
उन्हें त्याग चुका हू
खिडकी के परदे को हटाकर

देखती हवा सोचती है -कही ..मै लौट तो नही आया
मेरी चप्पलो को

मेरे चश्मे को
मेरी कमीज को
अब तक -विशवास ही नही हुवा है
कि
मै इस दुनिया में नही हू
किसी को याद कर लिखी कविताएं

अब मेरे बदले उसे
याद करती है
और
कहती है -
हमसे बिछड़े कवि के लिए
हमारी यही सच्ची श्रद्धांजली होगी
हमेशा के लिए
किशोर

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

तुम हो अनामिका

तुम हो अनामिका
जिससे मैंने
बिना ...पता ,नाम ,जाति धर्म के
मानव होकर
है जीना सीखा
तुम्हें अपनी पूजा के बदले
गुरु से आशीर्वाद है मिला
तुम अनाम हो
पर बहुमूल्य शब्दों से बनी हुवी
हो एक् अंतहीन कविता
मै तुम्हारी भक्ति और
ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हू
क्या ..तुम हो -
शिव की जता से
उतारी गंगा की भाति
एक् पवित्र सरिता

तुम्हें आदी शक्ति ने यदि
कुछ वरदान है दिया
तो तुम मेरा भी मंगल कर दो
जीते जी मै भी हो जाऊ
ज्ञान ज्योति से प्रज्वलित हो
इस ब्रम्हांड रूपी मंदीर मे
एक् कभी न बुझाने वाला
जलता हुवा दिया

तुम हो परिचित गूढ़ रहस्यों से
मै बस अगोपनीय ॥
फूल ,पत्ती ,
कूल ,नदी
पर्वत ..सागर ..और लहरों
के मेलो मे
खेत और खलिहानों मे
कभी जीवित या कभी
कटे हुवे फसलो सा -बिछा

तू हो अनामिका
मौन के अक्षरों कों साधकर
स्वयं बन गयी हो एक् गीता

किशोर
,



शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

पुल से तुम्हारे घर तक

पुल से तुम्हारे घर तक
पहुंची ..सड़क पर
मै
कभी नही चला हू
पुल तक आकर ...
लौटते हुवे मै ...
तुम्हें देखे बिना ....ही ...यह मान लिया करता हू
कि -
मैंने तुम्हें देख लिया है
मुझे लेकिन हर बार -
यही लगता है की -
बंद खिडकियों के पीछे ...
खडी हुवी तुम -
हर प्रात:
हर शाम
उगते और डूबते हुवे .....सूरज की तरह ..मुझे
जरूर देखती रही हो

सड़क के किनारे खड़े वृक्ष भी
अब
मुझे पहचानने लगे है
पत्तिया मेरे मन की किताब मे लिखी जा रही
कविताओ कों पढ़ ही लेती है
पुल पर बिछी सड़क कों
मेरी सादगी और भोलेपन से प्यार हो गया है
मेरे घर की मेज पर -जलता हुवा लैम्प
मुझसे पूछता है ..

क्या तुम्हारी कविता कभी समाप्त नही होगी ...?
मेरा चश्मा ...मेरी आँखों मे भर आये आंसूओ कों
छूना चाहता है
पर उसके पास भी हाथ नही है
काश तुम्हारी आँखों की रोशनी के हाथ लम्बे होते
और तुम मुझे छू पाती ......

किशोर





तुम सुमन हो मै रहू सदा बन कर महक




हर पल मुझे महसूस होता है तुम्हारी काल्पनिक उंगलियों का कोमल स्पर्श



लगता है -मुझे पन्नो सा पलटकर तुम पढ़ती हो सहर्ष



रुक जाती है जब मेरी कलम




तब तुम कहती हो -इसे लिखो ...




यह है इस कविता के लिये उपयुक्त शब्द



तुम्हारी और मेरी -भावनाओं और विचारों के एकत्व




के पश्चात -




एक् दूसरे कों याद करते रहना ..अब




महत्वपूर्ण है हम दोनों के मध्य



तुम्हारे बिना मै चल नही पाताएक् भी कदम



फिर भी तुम




कभी कभी कह देती हो मुझसे -"




मुझे भूल भी जाओगे तो आपके लेखन से मिली मानसिक संतुष्टी




मेरे लिये सात जनम तक न होगी कम



तब मै कांप जता हू भीतर ही भीतर डर ....




मै चाहता हू -इस तरह से भूलने -भूलाने की बाते




मुझसे तुम कभी न कहना ....चाहे फिर वह क्यों हो न स्वप्न



तुम सुमन हो मै रहू सदा बन कर महक



किशोर

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

मन ही मन ...



मन ही मन


मै उससे करता हू


निरंतर वार्तालाप


बदले मे


उसके नयन करते है


मुझसे -मूक संवाद



चाहे


इंजन के शोर से


भरा हो प्लेटफार्म


या


सड़के-


ट्रेफिक से से हूँ जाम


मेरे भीतर -उसकी परछाई ..


होती ही है साथ


उसे -


मुझसे अलग नही कर पाते


सागर की उंची उंची -


लहरों के भी हाथ


हमारी खामोश बातो कों


अनसुना कर


जानते हुवे भी -


अनभिग्य रहता है


खुला सारा आकाश



हमारे इस अदृश्य मिलन कों


कोई नही पाटा जान


न नदी के -


शाश्वत मोड़


न लहरोको छूकर ॥


सीढियों सा -


किनारों तक चढ़ते आये


बेतरतीब पाषाण


दुनिया वालो की दृष्टी मे -


मानो -


छिपने मे ...


हम दोनों के अंतर्मन हो निष्णात



ऐसे तो -


जीवन मे -


प्रतिकूल ही बहती है वक्त की धार



कभी वह बन जाती है


नाव


कभी मै बन जाता हू


पतवार



थक जाते है तो -


आओ करो विश्राम


यह कह कर


बुला लेती है .......


रेत पर बिखरी ॥


बबूल की छाँव



मै उससे पूछता आया हू -


कब तुम


सचमुच बोलोगी


और मै सुनूंगा कल्पना ॥!


तुम्हारी मधूर आवाज


लेकिन ......


आज जब उसने कहा


स्वप्न मे -मै बोल रही हू ,तुम्हारी कल्पना


मै तो हू ही तुम्हारे हरदम पास



फिर उसने मुझसे कहा


तुम लिखते रहना


तब तक कुछ


घंटो मे मै लेकर आती हू


तुम्हारे लिये प्रसाद


तबसे बैठा मै -यथार्थ ...


कर रहा हू


अपनी कल्पना का इंतज़ार


उसे मुझे बतलाना है -


बिना कल्पना के



मुझ यथार्थ कों ...


इस जग के सारे दृश्य ...


लगने लगते है


निमिष भर मे


बेजान और निस्सार


किशोर













शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

मै कह रहा हू सच

तुम्हारा

हर वाक्य -
हर शब्द ....

मुझसे लिखवाता रहा -कविता
और ..
धीरे धीरे
शब्द -निमग्न
कर गयी -मुझे
पवित्र .....
भावनाओं की यह काव्य -सरिता

मेरे व्यवहार मे
देख संकोचवश
एक् तरह की -औपचारिकता

तुमने कहा -
मुझे छोड़
बहुत आगे निकल गयी है

तुम्हारी कल्पना -शीलता


पर मै कैसे कह पाटा -
तुम्हारी और मेरी
देहो से अलग -
हमारी है ......
एक् ही आत्मा

आज भी मै चाहता हूँ
तुमसे -
नींद आने से पहले सुनना
एक् गीत
तुम्हारे शब्दों की उंगलियों के स्पर्शो से
मेरे मन कों भा जाए वह संगीत

कुछ भी छुटा नही है -
न तुम ..न मै
वही नदी है ......वही है तट
मै लौट आया हू


तुम्हारी और मेरी
उंगलियों कों - पकड़
साथ मे चलेगी
हमारी कल्पना
मै कह रहा हू सच
मै कह रहा हू सच


किशोर

मै हू एक् कविता ..

लगता है
मै ..कवि नही
एक् हू कविता

और तुम हो
मुझ
इस कविता की रचयिता

मेरी परछाई के बीज से
तुम्हारे मन के गमले मे
अंकुरित हुवा है एक् प्रेम का पौधा

जिसकी जड़ो मे -
तुम्हें सींचना पड़ता है
रोज -
प्यार का जल मीठा

उस पर खिले गुलाब की
पंखुरियो के रंग मे
तुम्हारी उंगलियों का
सुकोमल स्पर्श है ..मिला

तुम चाहती हो -
उसकी टहनियों मे
सदा -
ऊगी रहें नन्ही हरी पत्तिया

मै चाहे कवि होऊ
या एक् अंतहीन कविता
या नर्म हरी पत्तिया

पर

तुम्हारे विचारों के मन की
घाटियों मे -
तुम्हें पुकारता हुवा हू जीता

जब भी
तुम्हें
तुम्हारी तन्हाई मे
आ घेरेगा तम कोई सीरा

मै जल जाउंगा
ऊसी क्षण ...
तुम्हारे भीतर एक् दीप sarika

lagata hai mai kavi nahii
mai huu ek kavitaa

kishor

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

पाठक कोई कोई

aadharniy shankha jii ॥aapki kavita hindi me prastut hai ek baar padh kar dekhe thik anuvaad kar paya hu yaa nahi ॥?pathak koi koi ॥bahut saarii merii likhii -kavitaaye -nahii mere paas mujhe isakaa hai aabhaas isiliye kahatii hu -mai kaviytrii nahii huu -par-man me mere likhane laayak bharii hai bhavnaaye ....liye jiivan kaa saar isliye vahii likhatii rahatii hu jo -mujhse kahatii -merii antraatmaa kii avaaj aur isase yah bhi ho jaata hai ॥mujhe gyaan ki -tum pathako ki drishti kitanii hai saf mai sochatii hu -kavitaa hai ek phool lekin tum kahate ho yah hai -ek bhuul apanii komal bhavnaao ko pirokar mai banatii hu ek sundar phoolo ka haar lekin banaane se pahale hii tok kar tum kahate ho ...isase kya hogaa laabh








кιѕнσя: kavitaa me --akasar ॥viyog ...dukh aur drd ki hotii hai baat lekin -chahe jab ..kavitaa ...?tab lekar aatii .. har suhaagan ke liye milan kii madhur raat kavy-premiyo tum bhi ..ban jaao achchhe pathak ..tyag man ke vikaar yaa samajhana chaho kavitaa ko to puchh lo sahii arth ...kavi-ytrii sammukh hai aaj kavi -kaviytrii sab nahii ..maantii huu ...koi koi hai par -paathak bhi sab nahii dono hii hai sachchii baat *shankha paula keu keu pathok -shankha jii kii is bengaali kavita ka yah hindi anuvaad hai muul rup me yah kavita bahut gaharii bhavanaa liye huve hai us bhav ko mai anuvaad me kahaa tak chhu paya hu ise to aap hi bataayengii ...kripya ek baar padh kar dekhe aur ...sudhar kii gunjaais ho to bataaye ..sadar kishor 06-02-20109।11 a.m


पाठक कोई कोई

बहुत सारी मेरी लिखी कविताएं नही मेरे पास

मुझे इसका है अहसास

इसलीये -कहती हू

मै कवयित्री नही हू

पर मन मे मेरे -

लिखने योग्य भरी है ...भावनाए

लिये जीवन का सार

इसलीये वही लिखती रहती हू

जो

मुझसे कहती है

मेरी अंतरात्मा की आवाज

और .......

इससे मुझे

यह भी हो जाता है ज्ञान

कि -

तुम पाठको की दृष्टी कितनी है साफ़

मै सोचती हू ..........

कविता है एक् फूल

लेकिन

तुम कहते हो -

यह है एक् भूल

अपनी कोमल भावनाओं कों पिरोकर

मै बनाती हू

फूलो का एक् सुन्दर हार

पर

बनाने से पहले ही

तुम

कहते हो इसे बनाने से क्या लाभ

कविता मे

अक्सर

वियोग ,दुःख ...दर्द की

होती है बात

लेकिन

जब चाहे कविता ...?

तब

हर सुहागन के लिये

कविता लेकर आती है

मिलन की मधूर रात


काव्य प्रेमियों ....!

तुम भी बन जाओ एक् अच्छे पाठक

त्याग मन के विकार

या

समझना चाहो

कविता का सही अर्थ तो

पूछ लो .......

कवयित्री सम्मुख है आज


कवि -कवयित्री सब नहीं .होते
मानती हू ..कोई कोई है
पर
पाठक भी सब नही होते
कोई कोई होते है

दोनों ही है सच्ची बात


शंखा

अनुवादक ..किशोर बंगाली से हिंदी

जाते जाते कह रहा बसंत

टहनी पर खिले हुवे है फूल

उड़ते हुवे बादलो कों रुई सा -

आकाश रहा धुन

किनारों कों -नदी की लहरे भी छू रही बार बार -

पाकर हवा मंद मंदअपने अनुकूल

पत्तियों पर बन ...हरा रंग

खुद खुश हो रही धरती पर फैली हुवी - धूप

हिचकोले खाता ...सागर का जल

पृथ्वी कहती -देखो ...मै रही हू घुम

क्या मुझसे भी प्यार करोगे कहता पंखुरियो से

उन्हें चुभ कर -नुकीले शूल

हर हथेली की -रेखाओं पर -

सरसों और पलाश का रंग

भरने आया है फ़ीर फागुन

मल लो प्यार के इन्द्रधनुष कों पीसकर

आपस मे ॥चेहरों पर ..मनुज तुम

बस मुस्कुराते हुवे

शेष रह जाते चमकते श्वेत दन्त

मुख के बाक़ी हिस्सों पर -

कालिख पोत देता है होली मे हुड़दंग

पर पानी तो बचा लेना ....अपने लिये -

जाते जाते कह रहा बसंत

बहा देना इस बार -मुखौटे कों भी ...घिसकर -

मिश्रित रंगों के संग

फिर न रह जायेंगे -जीवन मे -

धर्म ॥जाति ..और नस्ल के विभिन्न झूठे दंभ

हवा कों भी सांस लेने देना

वृक्षों कों जलाकर -न ज्यादा फैलाना धूम

टहनी पर खिले हुवे है फूल

किशोर

न तुम कमीज हो

न मेरे मन के पास तुम्हें रोकने के लिये

दरवाजा है



तुम्हारी आँखों की खिडकियों मे -

मेरी आँखों कों तुम्हें देखने से -

मना करने के लिये ...

अब पर्दा ही लगा है

ऐसे भी -एक् दुसरे कों जानने के बाद -

न तुम कमीज हो

और

न मै रह गया हू देह

कि

-एक् दुसरे कों पहन सके

तुम अगर आकाश के बादलो कों छूने भी चली जाओगी

तो भी -

मैतुम्हारी चमक के सहारे ...

तुम तक पहुच ही जाउंगा

मृत्यु के उस पार भी

मै तुम्हें -खडा मिलूंगा ....

इंतज़ार करता हुवा

यह और बात है

कि -

शायद तुम मुझे पहचान लो

या
-न भी पहचानो ...

किशोर

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

जब तुम चुप हो जाती हो ...


जब तुम -
चुप हो जाती हो


कोरे पन्ने

कलम

और


शब्द सारे ...


मुझसे रूठ जाते है



दृश्य सभी गुम हो जाते है


वक्त की लहरों से रिश्ते ..
टूट जाते है


और


तन्हाई की -
नदी के मौन की सतह पर
बहते रेत की आंच मे
पिघल कर अरमान सब ...घुल जाते है


एकाएक -


पेडो के हरे पत्ते सूख जाते है


फूल झर जाते है -


चुभने के लिये -शूल रह जाते है


मानो कोई -


स्वीच आफ कर गया हो .....


मेरे जीवन के आकाश मे -
जगमगाते सितारे -
सारे बुझ जाते है



जब तुम मेरी कल्पना ....!
चुप हो जाती हो ...


कोरे पन्ने

कलम

और शब्द सारे ....


मुझसे रूठ जाते है


किशोर