बुधवार, 30 दिसंबर 2009

तुम



तुम विस्तृत आकाश हो


मै सिमित धरती



तुम उड़ते उन्मुक्त बादल हो


मै एक् लकीर पर बहती नदी


तुम सुन्दर स्वप्न हो


मै मन की शुभ antardrishtii



तुम बान्हे फैलाए तट हो


मै मंझदार मे


डगमगाती सी चिंतित खडी



तुम क्षितिज सा अप्राप्य हो


मै तुम्हें छूने के लीये


जिद्द पर हू अदि



तुम मिलन असंभव हो


मै विरह की जीती


अमिट जिन्दगी



तुम उदयाचल का सूर्योदय


मै अस्ताचल मे


अंतिम तम बन ठहरी



तुम निराकार अनश्वर सम्पूर्ण सत्य हो


मै साकार


देह बनी अधूरी



तुम महानगर मे सचमुच


गौरव पथ हो


वहां से इस


अबूझ गाँव तक की


मै हू अन्नत दूरी



किशोर



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