मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

सपनों के यथार्त ने मुझसे पूछा



सपनो के यथार्थ ने

मुझसे पूछा -

क्या तुम मेरे पास ही रहोगे

मैंने कहा -

तुम्हें देखते देखते

मै स्वप्न बन गया हूँ

तुम्हारा मन

तुम्हारे शब्द बन गया हूँ



तुम पढ़ सकती हो मुझे

अपने सौन्दर्य की आत्मा कों

निहार सकती हो मुझमे

लेकीन मै तुम्हारी आत्मा की देह तक

पहुच नही सकता

तुम्हारे ध्यान की रोशनी मुझे

आत्मसात नही कर सकती

क्योकि प्रेम सतत विरह है

तभी तक जीवन की चेतना मे

मै तुम्हें जीवित रख पाऊंगा

तुम्हें तलाश लेने के

पश्चात भी

तुम्हें खोये रहने की

मुझमे लगातार पीड़ा है

केवल मेरे पास

मेरी आँखे बंद हो

या खुली .........

हर परिस्तिथि मे

तुम्हारे परछाई की साकार देह की

महक है मेरे पास

केवल ..महक



किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: