सोमवार, 28 दिसंबर 2009

ईश्वर संबंधी मेरे मन की सच्ची बाते


१-मनुष्यों के पास समय नहीं है


२-अपने अपने काम मे इतना व्यस्त हो जाते है की फुर्सत ही नहीं मिलती

अपने लीये समय निकलना पडेगा ,तभी तो भगवान् की पूजा कर सकेंगे


३-गीता मे लिखे ज्ञान कों दूर या बाहर से सभी बताते एवं सुनाते है

मगर उस ज्ञान के अनुसार चलना कठिन है ,श्रोता तो हर कोई बन जाता है

४-मीठा मीठा सुनकर केवल समय कों व्यतीत करने से क्या लाभ

वातावरण कों असत्य बोलकर ,हम जहर घोलते है

५-मै आशावादी हू

ब्रम्हांड तो ओम नमः शिवाया मय है

इसलीये सम्पूर्ण जगत या संसार निराशावादी नहीं हो सकता

न है

६-युग के आरम्भ से ही सकारात्मक शक्ति की सरंचना हो चुकी है

७-ईश्वर हमारे भीतर ,बाहर ,चारो ओर है ...ईश्वर ने हमें सा कुछ दे रखा है

चाँद ,सूरज ,वर्षा ,फल ,फूल ,जीवित वृक्ष ..ये सब इत्यादि

८-यह महसूस करने पर पता चलता है की -

हममे आत्मा है

लोग ....सन्यासी ,संत के प्रवचन सुनते है ...जिनमे अधिकाँश धनवान और

सक्षम लोग ही होते है


९-विदेश घूमकर आये संतो कों बड़ा माना जाता है ,

१०=हमें आडम्बर ,प्रापंचो से दूर रह कर केवल ईश्वर का ही ध्यान और

स्मरण करना है

गुरु भगवान् स्वयं है ...केवल उसे याद करने भर से वे प्रकाशित हो जाते है


११-मेरा खुद का अनुभव यह है की -मुझे सतत ईश्वर के साथ रहना पड़ता है

वे प्रकाश के रूप मे मेरे भीतर ,बाहर ,चारो तरफ हरदम रहते है


सुनाने मे तो यह सरल लग रहा है या आश्चर्य मौ भी .........लेकीन

हर कोई उन्के सामीप्य मे रह सकता है

मन की आँखों से उन्हें देखना

अ-बहुत सुन्दर लगता है


शिव शिव कों प्रणाम करती हू

और अपनी बात कों विराम देती हू

ओम नमः शिवाया


आपकी बहन -

बरखा ग्यानी

रायपुर

२८-१२-09

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