रविवार, 20 दिसंबर 2009

एक् खुबसूरत भोर

अपनी अपनी देह कों छोड़
रहते मै और तुम
एक् दुसरे के मन मे हो आत्म -विभोर
बीच मे अनाम रिश्ते की है
यह अदृश्य सी ..दृढ महीन डोर
ढूढते है हमें ..
इसके दोनों अंतहीन छोर
विलुप्त सा लगता एक् दूजे मे
हमारे अस्तित्व का हर मोड़
जानना संभव नही है
आखिर मै और तुम
रहते कहाँ कब किस ओर
वियोग मे संयोग का लगता
यह जोर बेजोड़
jaise
चेतना बहती सर्वत्र
चुपचाप ..किये बिना शोर
निशा के आते ही
जब मै प्रकृति सा -
हो जाता हू निराकार और गौण
तब
तुम किरणों के जल बूंदों की छिटो से
करने आती हो
मुझे साकार और पुनर्जीवित ...
बन कर
धवल एक् खुबसूरत भोर
हर रोज
किशोर

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