मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

वे कहते है मुझसे

कोरे पन्ने मुझे
देखते ही
हो जाते है
कभी कभी प्रसन्न
वे कहते है मुझसे
आओ मेरी पीठ पर
लिखो एक् कविता अपनी मन पसंद
तुम्हारी स्याही का है
दुखमय या सुख मय रंग
तुम्हारे शब्दों के होते है
सुलझे सुलझे या
कभी बिखरे बिखरे से ढंग

मुझे लुभाते है कहते पन्ने
सांस रोक कर लिखती हुवी
तुम्हारी उंगलियों का संग
और
तुम्हारे बोलते मन का सत्संग
मुझे मालूम है -
लेखकीय क्षणों मे अन्तर्निहित
तुम्हारे हिरदय के मूल करुनामय
भावो के दृश्य सप्रसंग
इस जग मे
केवल लाठी ने साथ निभाया
जब हुवा
ठंडी रात मे
एक् भिखारी की देह का अंत

प्लेटफार्म की सीढियों पर बेहोश पडा
रह गया एक् युवक
बैठ बोगियों मे भीड़
ऐसे हुवी गायब
जैसे रेल के पहीयो मे ऊग आये हो पंख

ढाबे से फेंकी गयी जूठन कों
चाव से -
खाते देख एक् मानव कों
छोड़ गए आंसू तनहा मेरी आँखों कों
देख
सत्य का ऐसा कटु दर्शन

किशोर



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