रविवार, 27 दिसंबर 2009

समय का प्रेम



मेरा ना मेरीजाति ....मेरा धर्म

लोगो की तरह

मुझे पुकारते रहें ...

मै उन्हें छोड़ आया

करोडो चेहेरों की भीड़ से

बनी

इस अजनबी दुनिया के

सबसे लम्बे फुटपाथ पर

मै और मेरी यात्रा साथ साथ चल रहें है



मेरी यात्रा -

जिससे मुझे बेहद प्यार है

हम दोनों के मन एक् से है

कभी यात्रा मुझे तलाश करती है

और

कभी मै उसे खोजता हू

लेकीन

हम दोनों

सदियों से बने ..इस धरती पर

अकसर मिल ही जाया करते है

वो मेरी सुन्दर यात्रा है

और .....मै उसका हमसफ़र यात्री



किनारे से लगे ...

मचल रही लहरों के

समुद्र ने हमें देखा

थोड़ी दूर पर खड़े

सबसे ऊँचे पहाड़ ने हमें रोका

बादलो की तरह उड़ता हुवा

आकाश हमें ....छूने के लीये झुका

संसार के सबसे बड़े आँगन की तरह ...

इस घुमती हुवी धरती ने

हम दोनों से पूछा -

कहाँ जा रहें हो ॥?

हम दोनों ने कहा -वही जहां तुम जा रही हो

लोगो की भीड़ से निर्मित -सुनसान इलाके मे

टहलते हुवे लापता ने -

हाँ मे सिर हिला कर ..हमारा साथ दिया

चन्द्रमा झरी रजत किरणों कों

सूरज की तपिश से बचकर भाग आयी स्वर्णिम धूप कों

वृक्षों के नीचे विश्राम कर रही शीतल छाँव कों

नदी के संग मुड़ते हर लचीले मोड़ कों

थकी हुवी सडको कों

जंगल की खुली हवा मे सांस लेती चन्दन की महक कों

हवा के साथ लहलहाती फसल कों

रात मे जलती हुवी लालटेन की तरह ,..दिखायी देते

उस

प्राचीन गाँव कों ..................

सभी कों -हम दोनों का पता था

हम दोनों उन्हें जानते थे

वे सब हम दोनों कों करीब से पहचानते थे

और हम दोनों के अमर प्रेम कों भी ....



परन्तु

मनुष्यों के पास ..............

बड़े बड़े मकान थे

बड़ी बड़ी गाडिया थी

या उनसे भी बड़े बड़े सपने थे

उन्के पास

प्यार करने के लीये समय नही था

अपनों से या अपने आप से मिलने के लीये

वक्त नही था

इसलीये

वक्त के पास मनुष्यों कों सच बताने के लीये

समय नही था

मै और मेरी यात्रा समय के साथ है

समय का प्रेम .....

हम दोनों के साथ है

किशोर






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