बुधवार, 11 नवंबर 2009

तुम हो एक शब्द विरह


तुमहो एक शब्द विरह
और मै हू एक शब्द मिलन
तुम आ जाती
यदि
हवा सी
टहलती हुवी
यू ही -समुद्र तट पर


तो मै तुम्हारे स्वागत मे
लहरों के फूलो सा बिछ जाता

रेत पर
और तब -
तुम हो उठती सिहर


या फ़ीर
कभी
ऋतुराज की बांहों मे भरे
सरसों के पीले फूलो सा -होता आल्हादित

मृदु धूप सी जब तुम आती

कोहरे की जल से निखर कर


परन्तु ऐसा हो नहीं पाया
तुम चली गयी दूर रेल सी मुझे छूकर
मै देखता रह गया तुम्हें
जाते एक बोगी सा कटकर


अब रह गया हूँ अकेला
सोचता हूँ क्या करूंगा
ठंडी कांपती सूनी रात
के तनहा प्लेटफार्म सा -

जीकर


किशोर

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