शनिवार, 14 नवंबर 2009

चिर वियोग का क्षितिज


चिर वियोग का क्षितिज
तुम बनी रहना चिर वियोग का क्षितिज
चलता रहूँगा राह सा मै अंतहीन
ठहरूंगा नही किंचित
आजीवन
तुम्हें पाने के लीये
मै
बन एक पथिक
दर्दो कों शुलो सा सह जाऊँगा
ज़हर कों मधु -बूंदों सा पी जाउंगा
यादों के तेरे पाक -सुमनों कों चढा
हर मन्दिर
सीढियों से उतर फीर
जीता रहूँगा
बन एक गर्दिश
तुम यथार्थ और स्वप्न भी
तुम अन्नत दूरी और हो मेरे बहुत समीप
तुम खुश्बू मेरी
मै चन्दन सा वृक्ष
बाहुपाश मे तुम्हारे होने समाहित
मै भट्कुंगा-जन्मो तक
जान यह कि -तुम्हें पाना है
असंभवऔर कठिन
किशोर

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