बुधवार, 25 नवंबर 2009

धुप सा पढ़ता रहा

ऑटो की तरह तुम आयी
मै ..धूप
तुम उड़ते हुवे समय को
चुनरी सा
जाते हुवे ...
चौक मे खड़े शहर सा
दूर तक ..देखता रह गया

घड़ी के कांटे की तरह
एक लम्बी सड़क सा बाजार मे
घूमता हुवा
कभी -
केले के छिलकों
या
टोकरी से बाहर
लुड़क आए
ताजे संतरे की तरह
लोगो की निगाहों से भी बचता रहा

पैरो के पहियों से
बनी भीड़ को
नहर सा एकसार बहते हुवे
कभी -
खम्बे मे टंगे पोस्टर
पर बनी चित्र की -
दो घूरती आँखों की तरह
निहारता रहा

किसी टाकीज मे
अकेले ही
पिक्चर देखने वाले
एक मात्र दर्शक की तरह
अपना मन भर बोझ ..सहता रहा

खाली गिलास की तरह
किसी ठेले के स्टूल पर
बेफिक्र सा बैठा हुवा
कभी -
अखबारों के पन्नो मे
कड़ी मीठी चाय की चुस्की सा
एक ख़बर
तलाशता रहा

इस तरह
भीड़ के मनुष्यों मे
शब्दों की तरह बिखरी एक एक
कविता को
दिन भर
धूप सा पढ़ता रहा

किशोर

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