मंगलवार, 24 नवंबर 2009

वही लड़की तुम हो न

1-वो एक लड़की
जो सायकल चलती थी
दुपट्टे से सबकी नजरो के
तीरों के वार
बचाती थी
किताबो को छाती से लगाए
दिल मे अपनी ही छवि को
निहार मुस्कुराती थी
कभी किताब उसे पढ़ते
कभी वह किताबो को पढ़ती थी
सडको पर ॥
शहर को बस सा गुजर जाने देती थी
ठहर कर किसी उपवन मे
किसी गुलमोहर की छाँव मे
अपनी आँखों मे
एकांत के जिस्म को भरकर
मन ही मन ख़ुद से बाते करती थी
हरी हरी घास से
एक तिनका तोड़कर
वह उससे अपने
जीवन का अर्थ पूछती थी
पढ़कर सभी कक्षाए उतीर्ण होकर
ख्यालो को साथी बनाकर
उन्के संग जीना चाहती थी
वही लड़की तुम हो न

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