शनिवार, 14 नवंबर 2009

केवल तुम्हारे लिए


मन्दिर की सीढियों ने
हमेशा मेरा स्वागत किया
मूर्तियों ने -
मुझे
कभी नही कहा कि-

उन्हें मै प्रणाम करू
उसके
प्रांगन ने अपने एकांत मे मुझे बिठाकर रखा
बदले
मे मै उनकी मुस्कानों की तरह खुश हुवा

और उन्के हाथो के आर्शीवाद के समक्ष एक दिये सा ....जला भी
लेकिन
तुम
हमेशा
अदृश्य सी रहती हो
हमेशा
कहती हो - तुम्हारे पास वक्त नही है

मै तुम्हे एक लंबे ख़त की तरह बस...... जीवन भर पढ़ता रहा हू
वे
मुर्तिया ...
पाषाण
होकर भी कोमल महान सहिर्दय है
और
तुम ...
सहिर्दया
होकर भी कठोर पहाड़ बनी हुवी हो
मेरे
प्रेम की निगाहें तुम्हे -
देखना
चाहती है
आराधना
करना चाहती है तुम्हारी
तुम्हारे
मन के आँगन मे बैठकर -
मेरी
आत्मा तुम्हारे निश्छल सूनेपन मे
निष्कपट ध्यान मग्न हो जाना चाहती है
बदले
मे
हो
सकता है तुम मुझे - पुनर्जीवित कर सकोगी
मेरी मूक व्यथा को दूर कर
अपनी
स्नेह की आँखों की दिव्यता के मृदुल प्रकाश से
मुझे आलोकित कर ...सकोगी ...
पर तुम कहती हो तुम्हे
अपने
कार्य से फुरसत नही है


लेकिन मै भी पराजित नही होउंगा
मै तुम्हारे मन के शाश्वत मौन का संगीत हू
मै
तुम्हारी अंतरात्मा की ही तरह -
व्यापक

प्रेम के इन्तजार मे लीन

उदगम से समुद्र तक
फैली
महानदी सा एक विस्तृत
वक्त
हू ...तुम्हारे लिए ...हां केवल तुम्हारे लिए

किशोर

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