शनिवार, 14 नवंबर 2009


तु मुझे -

गुनगुना
रहे हो

या


तुम्हारी
लिखी हुवी

किसी
एक कहानी को

मै
जी रहा हू

या


अव्यक्त शब्दों की तरह

तुम्हारे
मन मे अभिव्यक्त हुवी

भावनाओं मे अपने लिए

एक
भावना तलाश रहा हू

पता
नही तुम कौन हो ...?

जिसके
इंतजार मे मेरी नींद ...

जगी
हुवी है

मुझे देख कर किसी ने

कुछ
कहा नही

अब
तक सिवा कुछ मनुष्यों के -

जिन्हें
मेरी जरुरत थी

अब
मै किससे पुछू की -

मै
कौन हू

आकाश
नदी वृक्ष और प्रकाश

बाहर मे ,भीतर मे एक जैसे है

चारो
ओर केवल मौन है

उसके
पदचापों की आवाज है

मै
घूम -फ़िर कर स्वयं को

कटघरे
मे खडा हुवा क्यो पा रहा हू

मै
क्यो चाह रहा हू -

की
तुम आओ

मुझे
-

निष्पाप
होने का दंड दो

मै
हू इसलिए तुम ...? भी हो

किशोर

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