शनिवार, 14 नवंबर 2009

सचमुच जीना सीखो


वह रह गयी है अकेली
देकर
मुझे तुम्हारे पास
क्यो
नही करते विशवास
तुम्हे
चाहिए थी मै ...
उसकी आत्मा की -
की
थी तुम्ही ने तो आश

फ़िर
इन तुम्हारे नयनो मे
जागती
क्यो है
मेरे
उस आकार को
पाने
की प्यास
तुम
हो दर्पण उसका
मै
तुम्हारे हिरदय मे समायी
बनकर धड़कन आज

वह केवल देह है मात्र
उसे
कर लेने दो
उम्र भर ...
इस
दुनिया के काज
सौप
गयी वह मुझे
तुम्हारे
साथ
अब तुम्हारी परछाई हू
वह
नही ...
मै
हू तुम्हारी ख़ास


उसे तो तुमसे
बात
तक करने की फुरसत नही
वो
क्या जाने प्यार का मधुर राज


मै उसकी आत्मा ही -
तुम्हारे
सपनो का हू रंग
तुम्हारे
गीतों का हू छंद

निराकार की सूनी बांहों मे
सचमुच
जीना सीखो
छोड़
साकार महानगर का
आकर्षक
संग
किशोर

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