गुरुवार, 12 नवंबर 2009

मासे लिखता हू चुपचाप



मै लिखता रहू चुपचाप


देखता रहू फैली चांदनी रात


झील की लहरे भी


निहारती रहे मुंझे


जल -निम्गन चाँद के साथ


मै लिखता रहू चुपचाप



सुखदायी हवा बहे तो


वृक्ष की पत्तिया पूछे -


पग्दंदियो पर कराहाती


धूल की परतो से -कैसे लग रही है


किरणों की शीतल मरहम पत्तीयो


यह श्वेत मीठी आंच



मै लिखता रहू चुपचाप



बुलाकर बिठा समीप


कहती बहती नाहर श्लील


बात एक ख़ास


मेहनती है यहाँ सभी


प्रेम के लिए


लोगो को


कहा मिल पाता है अवकाश



दूर वन के कोने मे


मौन के वृहत सूने मे


ऊग कर पत्थरो के सीने मे


प्यार के नम दूब कर रहे विश्राम


जरुरत हो तब


ख़ुद आयेगा


शहरो की सडको पर भटकता


अकेले पन का शिकार -


हर रेगिस्तान


मै लिखता हू चुपचाप


किशोर

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