गुरुवार, 5 नवंबर 2009

व्यापकता के महाशुन्य मे


बहते समय की

एक नदी का

बन संगीत

लीये अपने पगों मे

वन मयूरी का नृत्य

उस छोर पर

खडी हुवी कब मिलोगी

जहा शब्दों की भीड़

प्रेम की अंतहीन कविता सी

बन जाओगी तुम असीमित


मै एक पंछी कल्पनाओं के पंख -सहित

उडता रहता

तुम्हें तलाशने कवि -मन सा

इस छोर उस छोर सब ओर होकर आशान्वित



व्यापकता के महाशुन्य मे

मै विचरता

साश्चर्य कभी एक पगडंडी सा होकर भ्रमित

तुम कहती मै व्यस्त हू

वह कहता मै त्रस्त हू

कौन सुनेइस

सूनी जग अमराई मे ....

अब मेरा मीठा गीत




शीश पर धरी हुवी

तुम रहना

जमीन पर बिखरे पत्तियों की हथेली से

भोर की किरणों कों

कोहरे की टोकरी मे

टपके हुवे मदभरे महुवो सा बिन ऊसी


समय मै पहुचुन्गा

निकल निर्झर के उदगम से

एक पवन के झोंके सा भींग

तुम हो मेरी चिर - कल्पना अति -प्राचीन


किशोर



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