सोमवार, 2 नवंबर 2009

मुस्कान हँसी

वंशी की तानपर
इठलाती यमना के उस पार
कदम्ब की डालपर बैठे -कृष्ण भगवान्
और नदी के इस पार
खडी सोच रही राधा
विरह की आग
सी बढ़कर रास्ता मेरा रोक रही
कयों यह उफनती धारा
जाऊ तो जाऊ कैसे
सुन हे मधुर स्वर लहरी
जा कर बता दे यहाँ मै ठहरी
मुरली की धुन ने
बंद करायी
उनकी अंखिया
इतनी दूर से अब
कैसे करू मै
इशारों मे बतिया

प्रेम की पवित्रता तब
सावन की झडी बन बरसी
कदम की टहनियों पर चलती
बूंदों के स्पर्श से
राधा के प्यास के लिए
तब कृष्ण की ब्याकुलता फ़िर तरसी

दूर खडी राधा को देख
मन के अधरों पर एक मुस्कान हँसी

किशोर

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