शनिवार, 28 नवंबर 2009

चलो तकरार करते है

प्यार नही आज कर पाए
चलो तकरार करते है
किसी बात की नोक सा
बेवजह
एक दुसरे के मन में
वार करते है
कितनी बार कहें -
वो मुझसे की
मुझे वो याद -करते है
फिर भी चलो
आज उनसे पूछते है -
कि क्या वे मुझे भी याद -करते है ....?
चुपचाप सी
बहती नदी की लहरों ने
हमें आकर् रोका हो
लेकिन नदी से फिर भी -
चलो अब हम सवाल -
करते है
प्यार में न किसी की जीत है न हार
फिर भी मंझधार में धार और पतवार सा
एक -दुसरे को मात करते है
प्यार नही आज कर पाए
चलो तकरार करते है

किशोर

बुधवार, 25 नवंबर 2009

धुप सा पढ़ता रहा

ऑटो की तरह तुम आयी
मै ..धूप
तुम उड़ते हुवे समय को
चुनरी सा
जाते हुवे ...
चौक मे खड़े शहर सा
दूर तक ..देखता रह गया

घड़ी के कांटे की तरह
एक लम्बी सड़क सा बाजार मे
घूमता हुवा
कभी -
केले के छिलकों
या
टोकरी से बाहर
लुड़क आए
ताजे संतरे की तरह
लोगो की निगाहों से भी बचता रहा

पैरो के पहियों से
बनी भीड़ को
नहर सा एकसार बहते हुवे
कभी -
खम्बे मे टंगे पोस्टर
पर बनी चित्र की -
दो घूरती आँखों की तरह
निहारता रहा

किसी टाकीज मे
अकेले ही
पिक्चर देखने वाले
एक मात्र दर्शक की तरह
अपना मन भर बोझ ..सहता रहा

खाली गिलास की तरह
किसी ठेले के स्टूल पर
बेफिक्र सा बैठा हुवा
कभी -
अखबारों के पन्नो मे
कड़ी मीठी चाय की चुस्की सा
एक ख़बर
तलाशता रहा

इस तरह
भीड़ के मनुष्यों मे
शब्दों की तरह बिखरी एक एक
कविता को
दिन भर
धूप सा पढ़ता रहा

किशोर

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

३-कपास सी हलकी परछाई की तरह
मन आकाश मे
बादलो की तरह तैरती हुवी
तुम
अर्थवान विचारों मे
जीवन का सच खोजती हो
वो एक लड़की
जिसे अपने जैसी
ही एक एकांत के परछाई से
मिलना है
इस एकांत मे
सुखो के दुःख है
दुखो के सुख है
मृत्यु के बाद जीवन है
जीवन के बाद मृत्यु है
कुरूपता का सौन्दर्य है
सौन्दर्य की कुरूपता है
अस्थायी से लग रहे
जीवन मे
कहाँ पर स्थिरता है
स्थिरता के भाव के समुद्र मे
क्या ...
स्थिरता की लहरे भी है
इन सब विचारों की
भीड़ मे तुम
खोयी हुवी हो
और मई तुम्हे ढूढ़ रहा हूँ
वही एक लड़की हो न ..तुम
किशोर

वही एक लड़की हो न तुम

२-अपनी देह की आत्मा मे
अपनी आत्मा की देह मे
जाकर छिप जाना चाहती थी
लोग पुकारते रहे तुम्हे
और
तुम ॥
देह के घर के दरवाजो को
बंद कर
उसके भीतर शंकुंताला सी
ख्यालो के ध्यान मे
निमग्न हो जाना चाहती थी
वही एक लड़की हो न तुम

वही लड़की तुम हो न

1-वो एक लड़की
जो सायकल चलती थी
दुपट्टे से सबकी नजरो के
तीरों के वार
बचाती थी
किताबो को छाती से लगाए
दिल मे अपनी ही छवि को
निहार मुस्कुराती थी
कभी किताब उसे पढ़ते
कभी वह किताबो को पढ़ती थी
सडको पर ॥
शहर को बस सा गुजर जाने देती थी
ठहर कर किसी उपवन मे
किसी गुलमोहर की छाँव मे
अपनी आँखों मे
एकांत के जिस्म को भरकर
मन ही मन ख़ुद से बाते करती थी
हरी हरी घास से
एक तिनका तोड़कर
वह उससे अपने
जीवन का अर्थ पूछती थी
पढ़कर सभी कक्षाए उतीर्ण होकर
ख्यालो को साथी बनाकर
उन्के संग जीना चाहती थी
वही लड़की तुम हो न

सोमवार, 23 नवंबर 2009

tum sun leti ho


मै चुप हो जाता हूँ

तुम सून हो जाती हो

मै गीत गाता हू

तुम मीठी धुन हो जाती हो


मै इस जग की सुबह में -

उग आता सूर्य सा

तुम धूप बनकर बिखर जाती हो


बहते समय को

समेट नही पाता हू अपनी बाहों में

पर हर पल तुम -

आरम्भ बन जाती हो

पाकर दुःख कभी कभी यह जीवन लगता निरर्थक

तब तुम सुख बन जाती हो

पढ़ रही जो कविता मुझे निरंतर ॥

तुम उसे सुन लेती हो


किशोर

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

कविता

रश्मी जी की कविताएं
,आदमी वही है ,
बहुत देर हुवी ,
मेरी भावनाए -जाने कहा गए -
सत्य -जरुरी है
समझौता -मुश्किल है ,
-बहुत देर हुवी -उससे पहले -
ओस से रिश्ते -जाने कहाँ गए -
बुनियाद -
मूल्यांकन
इसे जानो
अनभिग्य ....?
विश्वाश करो
siikh
लोगे


रश्मी जी की कविताएं

मेरी भावनाए ,आदमी वही है , बहुत देर हुवी ,

बुनियाद , जरुरी है ,समझौता , मुश्किल है

सत्य ,अनभिग्य , कशिश ,मूल्यांकन

विरक्ति ,..मुजरिम , निस्तेज ,

{उससे पहले ,}इसे जानो ,ओस से रिश्ते

कुछ हुवा है ,विश्वाश करो

जाने कहाँ गए

तलाश

विश्वाश

प्रभु की बारी

माँ तुमने क्या किया

एक लड़की

एक बेचारा आदमी

सीख लोगे

एक प्रश्न

सोमवार, 16 नवंबर 2009

मुक्तक

जिंदगी हररोज तेरा नया रूप दिखाती हो,
कभी आशिक, कभी रकीब बनकर आती हो

एक टुकडा आसमान का जीने के लिए मिला
सितारे आते जाते है, अब तक चाँद नहीं मिला

गिरीश जोशी

पता

मेरे घर का पता वैसे तो हम भोपाल से एक साथ ही चलेंगे और मैं आपको १-२ दिन में वो सब जानकारी दे दूंगी फ़ोन न। आपको दे ही दिया है
मगर किसी कारण वश हमारी बात न हो पायी तो आपके पास मेरे घर का पता और फ़ोन न। होना ज़रूरी है
इसीलिए ये सेव कर लें डॉ विनोद जैन श्वेताम्बर जैन मंदिर के पास किरी मोहल्ला विदिशा घर का फ़ोन न. -07592 - 235301पापा का मोबाइल न. - 9827213001

रविवार, 15 नवंबर 2009

मुझे तुमसे प्यार है


मुझे तुमसे है प्यार


यह कहना है अपराध


प्यार मे मित्रता


या


मित्रता मे प्यार


शामिल हो जाए


तो उसे भूल कर भी न बताना


यही है जीवन का सार


न चाहते हुवे भी


ऐसा लेकिन

हो जाता है


हर कोई किसी न किसी को


चाहने लग जाता है


यह चाहत -एक बहुत उची है दीवार


या


एक है गहरी खाई


और हम सभी को


जाना है उस पार


पूजा पत्थरो की करते रहो


जीवन व्यतीत करने का


यह तरीका है सबसे आसान


मनुष्यों से प्रेम की


उम्मीद करना है बेकार


मुझे तुमसे है प्यार


यह कहना है अपराध


किशोर




कविताओ पर एक कविता

तुम कहाँ गए
हम तनहा है
वक्त मिले न मिले

आओ मेरे पास पास
ये बस मेरा मन है
नज्म तुम्हारी बनते है

जब भी मै तनहा ख़ुद को पाती हू
बीती यादें


आँखों मे नमी तेरी है

मेरी कविता तुम ही तो हो
नेह निमंत्रण बिसरा गए
आँखों मे इश्क भर क्यो नही देते हो


आखीर क्यू
मुमकीन नही है
कोई बात बने
अनाम प्रेम कहानी
न तुम भूले..न भूली जेनी
जिन्दगी एक बेशब्द किताब है

काश कोई जंजीर न होती
काश हम जंजीर बने न होते

लिखूंगी मै रोज एक ख़त
पैगाम चाँद को सुना जाना


संकलन -जेन्नी जी की कविताओ के शीर्षकों से बनायी गयी एक कविता
उन्के जन्म दिन १६-११-०९ के शुभ अवसर पर

किशोर
हम तनहा है
वक्त मिले मिले
आओ मेरे पास पास

मै इंसान हू
आजमाया हम को
थक गयी मै

तुम कहाँ गए
मेरी आजमाईश करते हो
ये बस मेरा मन है
नज्म तुम्हारी बनते है

आँखों मे नमी तेरी है
जिन्दगी एक बेशब्द किताब है

जब भी मै तनहा ख़ुद को पाती हू
वक्त मिले मिले
लिखूंगी मै रोज एक ख़त



मेरी जिन्दगी
ख़ुद पर कैसे लिखू
रिश्तो का लिबास सहेजना होगा
बीती यादें
ये बस मेरा मन है

मेरी कविता तुम ही तो हो



आँखों मे इश्क भर क्यो नही देते हो
नेह निमंत्रण बिसरा गए
आखीर क्यू
मुमकीन नही है
कोई बात बने
अनाम प्रेम कहानी

पैगाम चाँद को सुना जाना

उसका आखरी कलाम है

काश हम जंजीर बने होते
मेरी आँखों मे नमी तेरी है
काश कोई जंजीर होती

मेरी कविता मे तुम ही तो हो

तुम भूले.. भूली मै

हम दुनियादारी निभा रहे
तुम्हारी अतियों से डरती हू



























शनिवार, 14 नवंबर 2009

केवल तुम्हारे लिए


मन्दिर की सीढियों ने
हमेशा मेरा स्वागत किया
मूर्तियों ने -
मुझे
कभी नही कहा कि-

उन्हें मै प्रणाम करू
उसके
प्रांगन ने अपने एकांत मे मुझे बिठाकर रखा
बदले
मे मै उनकी मुस्कानों की तरह खुश हुवा

और उन्के हाथो के आर्शीवाद के समक्ष एक दिये सा ....जला भी
लेकिन
तुम
हमेशा
अदृश्य सी रहती हो
हमेशा
कहती हो - तुम्हारे पास वक्त नही है

मै तुम्हे एक लंबे ख़त की तरह बस...... जीवन भर पढ़ता रहा हू
वे
मुर्तिया ...
पाषाण
होकर भी कोमल महान सहिर्दय है
और
तुम ...
सहिर्दया
होकर भी कठोर पहाड़ बनी हुवी हो
मेरे
प्रेम की निगाहें तुम्हे -
देखना
चाहती है
आराधना
करना चाहती है तुम्हारी
तुम्हारे
मन के आँगन मे बैठकर -
मेरी
आत्मा तुम्हारे निश्छल सूनेपन मे
निष्कपट ध्यान मग्न हो जाना चाहती है
बदले
मे
हो
सकता है तुम मुझे - पुनर्जीवित कर सकोगी
मेरी मूक व्यथा को दूर कर
अपनी
स्नेह की आँखों की दिव्यता के मृदुल प्रकाश से
मुझे आलोकित कर ...सकोगी ...
पर तुम कहती हो तुम्हे
अपने
कार्य से फुरसत नही है


लेकिन मै भी पराजित नही होउंगा
मै तुम्हारे मन के शाश्वत मौन का संगीत हू
मै
तुम्हारी अंतरात्मा की ही तरह -
व्यापक

प्रेम के इन्तजार मे लीन

उदगम से समुद्र तक
फैली
महानदी सा एक विस्तृत
वक्त
हू ...तुम्हारे लिए ...हां केवल तुम्हारे लिए

किशोर

चिर वियोग का क्षितिज


चिर वियोग का क्षितिज
तुम बनी रहना चिर वियोग का क्षितिज
चलता रहूँगा राह सा मै अंतहीन
ठहरूंगा नही किंचित
आजीवन
तुम्हें पाने के लीये
मै
बन एक पथिक
दर्दो कों शुलो सा सह जाऊँगा
ज़हर कों मधु -बूंदों सा पी जाउंगा
यादों के तेरे पाक -सुमनों कों चढा
हर मन्दिर
सीढियों से उतर फीर
जीता रहूँगा
बन एक गर्दिश
तुम यथार्थ और स्वप्न भी
तुम अन्नत दूरी और हो मेरे बहुत समीप
तुम खुश्बू मेरी
मै चन्दन सा वृक्ष
बाहुपाश मे तुम्हारे होने समाहित
मै भट्कुंगा-जन्मो तक
जान यह कि -तुम्हें पाना है
असंभवऔर कठिन
किशोर

तु मुझे -

गुनगुना
रहे हो

या


तुम्हारी
लिखी हुवी

किसी
एक कहानी को

मै
जी रहा हू

या


अव्यक्त शब्दों की तरह

तुम्हारे
मन मे अभिव्यक्त हुवी

भावनाओं मे अपने लिए

एक
भावना तलाश रहा हू

पता
नही तुम कौन हो ...?

जिसके
इंतजार मे मेरी नींद ...

जगी
हुवी है

मुझे देख कर किसी ने

कुछ
कहा नही

अब
तक सिवा कुछ मनुष्यों के -

जिन्हें
मेरी जरुरत थी

अब
मै किससे पुछू की -

मै
कौन हू

आकाश
नदी वृक्ष और प्रकाश

बाहर मे ,भीतर मे एक जैसे है

चारो
ओर केवल मौन है

उसके
पदचापों की आवाज है

मै
घूम -फ़िर कर स्वयं को

कटघरे
मे खडा हुवा क्यो पा रहा हू

मै
क्यो चाह रहा हू -

की
तुम आओ

मुझे
-

निष्पाप
होने का दंड दो

मै
हू इसलिए तुम ...? भी हो

किशोर

सचमुच जीना सीखो


वह रह गयी है अकेली
देकर
मुझे तुम्हारे पास
क्यो
नही करते विशवास
तुम्हे
चाहिए थी मै ...
उसकी आत्मा की -
की
थी तुम्ही ने तो आश

फ़िर
इन तुम्हारे नयनो मे
जागती
क्यो है
मेरे
उस आकार को
पाने
की प्यास
तुम
हो दर्पण उसका
मै
तुम्हारे हिरदय मे समायी
बनकर धड़कन आज

वह केवल देह है मात्र
उसे
कर लेने दो
उम्र भर ...
इस
दुनिया के काज
सौप
गयी वह मुझे
तुम्हारे
साथ
अब तुम्हारी परछाई हू
वह
नही ...
मै
हू तुम्हारी ख़ास


उसे तो तुमसे
बात
तक करने की फुरसत नही
वो
क्या जाने प्यार का मधुर राज


मै उसकी आत्मा ही -
तुम्हारे
सपनो का हू रंग
तुम्हारे
गीतों का हू छंद

निराकार की सूनी बांहों मे
सचमुच
जीना सीखो
छोड़
साकार महानगर का
आकर्षक
संग
किशोर

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

मासे लिखता हू चुपचाप



मै लिखता रहू चुपचाप


देखता रहू फैली चांदनी रात


झील की लहरे भी


निहारती रहे मुंझे


जल -निम्गन चाँद के साथ


मै लिखता रहू चुपचाप



सुखदायी हवा बहे तो


वृक्ष की पत्तिया पूछे -


पग्दंदियो पर कराहाती


धूल की परतो से -कैसे लग रही है


किरणों की शीतल मरहम पत्तीयो


यह श्वेत मीठी आंच



मै लिखता रहू चुपचाप



बुलाकर बिठा समीप


कहती बहती नाहर श्लील


बात एक ख़ास


मेहनती है यहाँ सभी


प्रेम के लिए


लोगो को


कहा मिल पाता है अवकाश



दूर वन के कोने मे


मौन के वृहत सूने मे


ऊग कर पत्थरो के सीने मे


प्यार के नम दूब कर रहे विश्राम


जरुरत हो तब


ख़ुद आयेगा


शहरो की सडको पर भटकता


अकेले पन का शिकार -


हर रेगिस्तान


मै लिखता हू चुपचाप


किशोर

बुधवार, 11 नवंबर 2009

तुम हो एक शब्द विरह


तुमहो एक शब्द विरह
और मै हू एक शब्द मिलन
तुम आ जाती
यदि
हवा सी
टहलती हुवी
यू ही -समुद्र तट पर


तो मै तुम्हारे स्वागत मे
लहरों के फूलो सा बिछ जाता

रेत पर
और तब -
तुम हो उठती सिहर


या फ़ीर
कभी
ऋतुराज की बांहों मे भरे
सरसों के पीले फूलो सा -होता आल्हादित

मृदु धूप सी जब तुम आती

कोहरे की जल से निखर कर


परन्तु ऐसा हो नहीं पाया
तुम चली गयी दूर रेल सी मुझे छूकर
मै देखता रह गया तुम्हें
जाते एक बोगी सा कटकर


अब रह गया हूँ अकेला
सोचता हूँ क्या करूंगा
ठंडी कांपती सूनी रात
के तनहा प्लेटफार्म सा -

जीकर


किशोर

तुम हो एक शब्द विरह


तुमहो एक शब्द विरह

और मै हू एक शब्द मिलन


तुम आ जाती

यदि

हवा सी

टहलती हुवी

यू ही -समुद्र तट पर


तो मै तुम्हारे स्वागत मे

लहरों के फूलो सा रेत पर बिछ जाता

और तब -

तुम हो उठती सिहर



या फ़ीर

कभी

ऋतुराज की बांहों मे भरे

सरसों के पीले फूलो सा -होता आल्हादित


परन्तु ऐसा हो नहीं पाया

तुम चली गयी दूर रेल सी मुझे छूकर

मै देखता रह गया तुम्हें

जाते एक बोगी सा कटकर


अब रह गया हूँ अकेला

सोचता हूँ क्या करूंगा

ठंडी कांपती सूनी रात

के तनहा प्लेटफार्म सा जीकर


किशोर


गुरुवार, 5 नवंबर 2009

मेरे जीवन की कश्ती

तेरे प्यार की लहरे
करती है मस्ती
तैर रही उस पर
मेरे जीवन की कश्ती
तेरी चाहत ,मंझधार के सूने मे
मुझसे कुछ कहती

झिलमिलाते किरणों सी
फ़ीर तुम्हारी धूप सी
मुस्कुराहटे है हंसतीतेरी
निगाहों के इस खुबसूरत झील मे
मुझ डगमगाती नैया की
अब क्या है हस्ती

किशोर

चिर -वियोग का क्षितिज


चिर वियोग का क्षितिज


तुम बनी रहना चिर वियोग का क्षितिज

चलता रहूँगा राह सा मै अंतहीन

ठहरूंगा नही किंचित

आजीवन

तुम्हें पाने के लीये

मै

बन एक पथिक


दर्दो कों शुलो सा सह जाऊँगा

ज़हर कों मधु -बूंदों सा पी जाउंगा

यादों के तेरे पाक -सुमनों कों चढा

हर मन्दिर

सीढियों से उतर फीर

जीता रहूँगा

बन एक गर्दिश



तुम यथार्थ और स्वप्न भी

तुम अन्नत दूरी और हो मेरे बहुत समीप

तुम खुश्बू मेरी

मै चन्दन सा वृक्ष


बाहुपाश मे तुम्हारे होने समाहित

मै भट्कुंगा-जन्मो तक

जान यह कि -तुम्हें पाना है

असंभवऔर कठिन


किशोर

व्यापकता के महाशुन्य मे


बहते समय की

एक नदी का

बन संगीत

लीये अपने पगों मे

वन मयूरी का नृत्य

उस छोर पर

खडी हुवी कब मिलोगी

जहा शब्दों की भीड़

प्रेम की अंतहीन कविता सी

बन जाओगी तुम असीमित


मै एक पंछी कल्पनाओं के पंख -सहित

उडता रहता

तुम्हें तलाशने कवि -मन सा

इस छोर उस छोर सब ओर होकर आशान्वित



व्यापकता के महाशुन्य मे

मै विचरता

साश्चर्य कभी एक पगडंडी सा होकर भ्रमित

तुम कहती मै व्यस्त हू

वह कहता मै त्रस्त हू

कौन सुनेइस

सूनी जग अमराई मे ....

अब मेरा मीठा गीत




शीश पर धरी हुवी

तुम रहना

जमीन पर बिखरे पत्तियों की हथेली से

भोर की किरणों कों

कोहरे की टोकरी मे

टपके हुवे मदभरे महुवो सा बिन ऊसी


समय मै पहुचुन्गा

निकल निर्झर के उदगम से

एक पवन के झोंके सा भींग

तुम हो मेरी चिर - कल्पना अति -प्राचीन


किशोर



सोमवार, 2 नवंबर 2009

मुस्कान हँसी
वंशी की तानपरइठलाती यमना के उस पारकदम्ब की डालपर बैठे -कृष्ण भगवान्और नदी के इस पारखडी सोच रही राधाविरह की आगसी बढ़कर रास्ता मेरा रोक रहीकयों यह उफनती धाराजाऊ तो जाऊ कैसेसुन हे मधुर स्वर लहरीजा कर बता दे यहाँ मै ठहरीमुरली की धुन नेबंद करायीउनकी अंखियाइतनी दूर से अबकैसे करू मैइशारों मे बतिया प्रेम की पवित्रता तबसावन की झडी बन बरसीकदम की टहनियों पर चलतीबूंदों के स्पर्श सेराधा के प्यास के लिएतब कृष्ण की ब्याकुलता फ़िर तरसीदूर खडी राधा को देख

मन ही मन खुशिया बहुत हँसी

मुस्कान हँसी

वंशी की तानपर
इठलाती यमना के उस पार
कदम्ब की डालपर बैठे -कृष्ण भगवान्
और नदी के इस पार
खडी सोच रही राधा
विरह की आग
सी बढ़कर रास्ता मेरा रोक रही
कयों यह उफनती धारा
जाऊ तो जाऊ कैसे
सुन हे मधुर स्वर लहरी
जा कर बता दे यहाँ मै ठहरी
मुरली की धुन ने
बंद करायी
उनकी अंखिया
इतनी दूर से अब
कैसे करू मै
इशारों मे बतिया

प्रेम की पवित्रता तब
सावन की झडी बन बरसी
कदम की टहनियों पर चलती
बूंदों के स्पर्श से
राधा के प्यास के लिए
तब कृष्ण की ब्याकुलता फ़िर तरसी

दूर खडी राधा को देख
मन के अधरों पर एक मुस्कान हँसी

किशोर