रविवार, 11 अक्तूबर 2009

अनामिका संगनी

अंचल सखी अतिथि मितवा तुम भी
सुन लो कहाँ है ..?मेरा निज बसेरा
अस्ताचल की घाटी मे अगणित किरणे
सोती है वही है मेरा लघु डेरा

किंजल्क जाल मे क्यो ..?छिपी हो
चुराकर मेरे भोले मन कीभोली नगमा
हे अनामिका ,आओ आओ मै तनहा हूँ
जननी धरणी मे फैलाए खुशियों का मजमा

पावनता की जल निधी मे
तुम डालफिन सी तैरती हो
किशोर निर्झर की फेनिलता से
मन ही मन प्राणों से मनुहार करती हो

अमृत गगरी लेकर चलती हो
अम्बर के पवन रथ मे
तुमसे मिलने को हिम समाधी
लेकर भटके प्रेम ,निर्जन पथ मे

उपवन विहार करने
आओ आओ मेरी रानी
आंसू कवि तड़फ रहा
लिखने ,तितली की पाखो मे करूँ कहानी

मेरे द्रवित संवेदनाओं को करना है
तुम्हारी माशुमियत से अनुवाद
मेरी अनामिका कहाँ हो ..?कब मिलोगी
तुम्हारी न्यारी चितवन से मुझे करना है संवाद

मेरी अंजलि मे अश्रु है
मोम मंद मंद जलता है
उन्के हाथो से पल्षा के दोने से
ओले पीने को जी मचलता है

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