सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

पहाड़ से उतरती हुवी

मेरे जीवन की चेतना का
तुम अमृत हो
डूबा रहता है कलम सा मन मेरा
ख्यालो की स्याही मेसुबह शाम

बाह्य आवरण है दिनचर्या के काम
जैसे अपने बाहुपाश मे भर
सुरक्षित रखता है
मुझे
मेरी देह का यह मकान

मेरी इस
कल्पना के वीरान संसार
मे फूलो की पंखुरियों सी कोमल
शीतल जल के बहाव सी रेत
पर हो अंकित
एक गीत चल चल कल कल

किरणों और बादलो के पल पल
बदलते रंगों के धागों से
बनी पोशाक की हो तुम धारण

पहाड़ से उतरती हुवी
विचार मगना
तुम एक क्वारी पगडंडी सी
अकेली
चिंतन हो तनहा

या
खुबसूरत ,मनमोहक ,प्रकृति हो
सोचती रहना
पर मुझ कवि की भावुकता का
हे शाश्वत यौवना
मत करना उपहास
समझो हम दोनों है
एक दूजे के लिए
जीवित उपहार
मै सौन्दर्य का पुजारी
और tum
प्रकृति करती हो
नित नव श्रृंगार
{किशोर }

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