रविवार, 11 अक्तूबर 2009

अनामिका संगिनी

मेरी अनामिका दूरदर्शी होगी
सम्पूर्ण फूलो मे रंग भारती होगी
यह सारे झूठ मूठ दिलो की गाथा
झोको संग बहती हवा ,उन्हें ख़बर देती होगी

स्वाती नक्षत्र की जल बुँदे
अब तो बरस जाओ
मेरे ह्रदय का चातक व्याकुल है
उन्हें तृप्त कर जाओ

पञ्च महाभूत की मलिका
दे दो मुझे अक्षय नीलकमल
आज रोम रंद्र कह रहा है अपना
भेंट करो ,अनुपम गीत गजल

ओंकार ध्वनी की बस्ती बसा दी हो
मेरे पुतली पनघट तट पर
मोहक हंसो से मुस्कुराया है मौन
मृदु वाणी से सहलाती हो सच मे

स्वामी प्रेम स्वागतम ओशनिक