मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

अमराई मे जब

अमराई मे जब
प्रथम बार महके थे आम

मेरे मन की बौरायी देह को
तब भर गया था
बसंत का मदहोश बाहुपाश

मेरे नव यौवन के रुख को
अपने गुलाल से
रंग गए थे
एकांत मे मेरे
तब
खिले पलाश

पीली सरसों की फूलो सी
स्वर्णिम मेरी
सुंदर छवि निहार
दर्पण ने रख लिया है
मुझे तब से
अपने पास संभाल

नदी ने ओढी थी
मेरी चुनरी
सितारों का टांक
रजत प्रकाश

तब से अब तक
हर आईने मे
जडी हुवी मै
जीवित हूँ उसी प्रकार
कर के भी
इतनी उम्र पार

मेरी दिनचर्या मे
उस षोडशी की
परछाई निभाती है
इस जग मे
दैनिक जीवन का सम्पूर्ण
व्यवहार और व्यपार

लाँघ कर
इन्द्रधनुषी
कांच की दीवार
कभी न उतार पाउंगी
इस संसार की माया मे
होकर साकार

जब भी झांकती हूँ
अपने उम्र के आईने मे
बने
विभिन्न
प्रतिबिम्ब
साल दर साल
का सार
वही पर हीरे सी चमकती
स्वयं को जडी हुवी पाती हू
एकटक
उस ठहर सी गयी स्वयं का
सजीव सौन्दर्य निहार

इस मुझ पर केवल
इसकी कल्पना के
इस कवी का
मै जानती हू
है अधिकार

जिसकी रचना मे
रहती उपस्थित
जानती हूँ
उसकी
हर कविता मे
प्राण फूंकने
का
मै ही हूँ
मूल प्रेरक आधार

{किशोर }

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