सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

कर मत मानव तू भूल

अर्थ अपना कभी न
बताये जिन्दगी
अगेय है उसके उसूल

व्यक्ति अपने ही बांटे दर्दो को
इस जग मे रहा वसूल

तिनका एक भी तोड़कर
उसे फ़िर
जोड़ सकते हो मुझसे
पूछ रहा अटूट मूळ

मुक्त धरती का घूमता पहिया
स्वतन्त्र
अम्बर का
उड़ता पंख है
फ़िर क्यो तलाश रहे
मुक्ति अगुध

चेतना का एक भी अंश
यहाँ नही निर्मूल
सबका धड़क रहा दिल
जड़ नही है
कण कण से निर्मित धूल

सम्पूर्णता को जान ले
छोड़ अपनी दृष्टि मे बसाया
kalpanik स्वरूप
कर मत मानव तू भूल

किशोर

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