सोमवार, 7 सितंबर 2009

मुझे अपनी शरण मे रखो

हरी पत्तियों से लदी हुवी है टहनिया

शाखाओं को अपने शीश पर उठाये दरख्त

के तने से उतरकर

उछल -कूद कर रहीं है गिलहरिया


हर तरफ़ रंग है

आसमान नीला है

सूर्य किरणों को पीकर

अनेक रंगों मे खिली हुवी है पंखुरिया


उगी हुवी दूब की प्यास

ओस की नामी है

खुशियों को लेकर संग चली

इस धरती के पास

प्यार की क्या कमी है


वर्षा की बूंदों से मै भींगा भींगा हूँ

ठंडी पुरवाई से मै घिरा घिरा हूँ


पर ....

मेरे मन मे

क्यो है रेगिस्तान के बेचैन रेतो की तन्हाई

लहरों की भीड़ पाकर भी

सागर का तट रहता है तनहा

कमल खिलाकर

असंख्य

सरोवर के जल को लगता

अपना दर्पण फ़िर भी

मौन और सूना


हर तरफ़ दृश्य है

सबको तस्वीर सा देखता हूँ

मई पर ....

कहा दूब पता हूँ ...?>

किसी झील की गहरी आँखों मे

कण कण

जन जन

के मन की

अथाह है गहराईया


मुझे भी एक चित्र सा निहारती होगी चिडिया

मुझे आते जाते देखकर

किनारे पर खड़े

घने वृक्षो से

मेरे बारे मे भी पूछती होंगी पग्दंदिया


इसलिए तुममे

और तुम्हारे चित्र मे मै

अन्तर नही कर पाता

तन को भेदकर तुम्हारे मन का सामीप्य पाकर

मुझे

ऐसा लगता है

जरुर घटी हर

हमारे बीच की दुरीया


इसलिए मै कहता हूँ

सम्पूर्ण जगत है

प्यार के फ्रेम मे जड़ा

सजीव सा ....

लगता एक चल चित्र

यही सच है मेरे मित्र


हम सब है

एक ही सत्य की

अनंत -नदी के आईने मे

प्रगत हुवी असंख्य परछाईया


मई निहारता तुममे

प्रकृति का सम्पूर्ण सौन्दर्य

अभिभूत होता तुमसे

विचार कर

तुम्हारा सामीप्य


प्रेम स्मरण की अंतहीन श्रृंखला है


रखो मुझे अपनी चेतना के

सरस अंश मे

मै पथीक थका धरती की घुमाव दार राह मे

मुझे अपनी शरण मे रखो

त्याग सभी भ्रांतिया


(किशोर}




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