रविवार, 27 सितंबर 2009

शाश्वत तथ्य

यू तो खुल जाते है माँ गीता कों पढ़कर ही जीवन के सभी गूढ़ रहस्य फ़ीर भी सोच रहा हूँ अपने लीये ढूढ़ लू एक नूतन आदर्श मै आकर्षित हो जाता हू देख प्रकृति का मोहक सौन्दर्य मन के एक आँगन मे जानकार मनुष्यों का विभिन्न निजत्व अलग अलग सबकी बोली रंगों कों भर कर बादल बना रहें धरती के द्वार क्षितिज पर खुबसूरत रंगोली अनुभव करती चेतना के संग बस बहता जाऊ यही लगता सत्य तुम भी अपना दुःख हर लो हो कर स्वात्मा सा अभिव्यक्त मै देखता हूँ सब दृश्य मै हूँ एक मनुष्य लेकीन भ्रम वश भूल सम्पूर्णता कों सच लगता निज स्वार्थ वश केवल अपने दृष्टीकोण का सामीप्य बिना करुणा के प्रेम नहीं उपजता हम सब एक है यही है -शाश्वत तथ्य

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