सोमवार, 21 सितंबर 2009

मै एकाकार हुवा हूँ

लघु तन
वृहद् मन
अति सामान्य
पर
प्रेम भावः लिए
सुविचार हुवा हू

हर पत्ता
trin तक
कण कण सहित सब
हर क्षण लगते अपना
ओस बूंद का एक सपना
मानो
महा आकाश हुवा हूँ

सब मुझं मे
मै सब मे
छाँव धुप
सुख दुःख
निहित मुझमे
मै एकाकार हुवा हूँ

{किशोर }

2 टिप्‍पणियां:

Harkirat Haqeer ने कहा…

हर पत्ता
trin तक
कण कण सहित सब
हर क्षण लगते अपना
ओस बूंद का एक सपना
मानो
महा आकाश हुवा हूँ

sunder bhav ....ye trin samajh nahin aaya ...!!

kishor kumar khorendra ने कहा…

ji shukriya