शनिवार, 12 सितंबर 2009

विस्तृत वन

विस्तृत वन
मे
पथ के
बहके हुवे है कदम

चुपचाप बह रहे है
निर्जन के क्षण

सहित
झर रहे है
मौन - शब्द

पीले भूरे रंग
वृक्ष से पत्तो के संग

बह रहा समीर मंद

स्थिर लग रहे दृश्य

ठिठकी हुवी सी
है परछाईया सब

बाहों मे धुप के
छाया की नर्म देह भी
आलिंगन के आंच से
हो गयी है गरम

स्रोत का मोह त्याग
पहाड़ से उतरकर
प्रेम मे डूबी
सागर की तरफ़ जा रही
नदिया कह रही
मुझसे
आओ पास मेरे
यही है अवसर
मुझमे डुबाकर अपना चेहरा
उतार लो madhaa
mukhautaa saa aadmbar
mera jal hae

mithaa
पवित्र
और निर्मल

{किशोर }

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