सोमवार, 7 सितंबर 2009

सबको तस्वीर सा देखता हूँ

वर्षा की बूंदों से

मै

भींगा भींगा हूँ

ठंडी पुरवाई से

मै

घिरा घिरा हूँ

पर मेरे मन मे

क्यो है रेगिस्तान की बेचैन रेतो की

तन्हाईया

जैसे

लहरों की भीड़ पाकर भी

सागर का तट

रहता है तनहा

कमल खिलाकर

असंख्य

सरोवर के जल को

विस्तृत निज दर्पण

मौन और सूना है लगता

हर तरफ़ दृश्य है

सबको तस्वीर सा देखता हूँ

पर

कहाँ दूब पाता हूँ

झील की आँखों मे

कण कण जन जन

के मन की अथाह है

गहराईया

मुझे भी चित्र सा

निहारती होंगी

चिडिया

आते जाते देखकर

किनारे पर खड़े

घने वृक्षो से

मेरे बारे भी

पूछती होंगी

पग्दंदिया

{किशोर }

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