सोमवार, 7 सितंबर 2009

प्यार की क्या कमी है

हरी पत्तीयों से लदी हुवी है टहनिया

शाखाओं को अपने शीश पर उठाये दरख्त

के तने से उतरकर

उछल कूद कर रही है गिलहरिया

हर तरफ़ रंग है

आसमान नीला है

सूर्य किरणों को पीकर

अनेक रंगों मे खिली पंखुरियों सा पंख

लिए उड़ रही है तितलिया

उगी हुवी दूब की प्यास

ओस की एक बूंद नमी है

खुशियों को लेकर साथ चली धरती के पास

प्यार की क्या कमी है

{किशोर }

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