गुरुवार, 13 अगस्त 2009

इस मन नदी के

जल मे
हिलता
देख ....
आकाश
कहता
मुझसे
लहरों से लिपटा सूर्य प्रकाश
बैठो समीप
ईस सदी के
सूना करो
कभी कभी
आकर्
समय की बलखाती धारा के गीत
कभी
दुखमय संगीत
या
कलकल के शोर हँसी के
पर
महसूस करो
बाहों की तरह विस्तृत किनारों पर उगे
वृक्षो की छोटी -बड़ी पत्तियों कों पारकर आते
उल्लास सही के
लेकीन
खो
न जाना
बहुत बहुत गहराई के घने एकांत मे
बैठा है सत्य
भीतर
इस मन नदी के
{किशोर }

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