शनिवार, 8 अगस्त 2009

मै हूँ माँ गंगा

अर्पित भावनाओं
जल से
भरी हुवी
प्राथना के
मृदु क्षणों मे
बह कर
अविरल अश्रु कणों
डूबी हुवी
मैहूँ माँ गंगा

सौप कर
दुःख अपना
लौट कर जाते है
जन -मन
लेकर
भावी जीवन के लीये
नया सुखद सपना
मै उन्हें आशीर्वाद देती हूँ
पर उनकी मेरे पास रह गयी
धरोहर
परछाईयों के अतीत के
मुझे होता है जीना
मै माँ हू गंगा

मै चिता नही चन्दन की
पर चिंता करती हू हर तन की
सुगंध बन सब मन उड़ जाते
स्वजनों की आँखों की पीडा हर
लौटती लहरों से लिपटा दुःख सबका
मै हूँ माँ गंगा

{किशोर }

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