शनिवार, 20 जून 2009

सच्ची बात {a true photo ...needs no oath }

ऐसे
यह कहते ही
आपस मे
की
मै तुमसे प्रेम करता हूँ
पानी मे आग लग जाती है
एक बीज अंकुरित हो जाता है

एक
कहानी
के जीवन मे
एक ट्रेन -स्टेसन से छुट जाती है

कुछ ऐसा ही
तुम्हारा
और मेरा
अमर रिश्ता है

हम दोनों
रेल की दो समानांतर पट -रिया है
और
तुम्हारे और मेरे नाम की एक रेल
सतत ।
हमारी धडकनों की तरह
धडधडाती हुवी
इन पटरियों के ऊपर से गुजर रही है

मै केवल तुम्हारे

घने
सच्चे
मेरे लिए अब बन गए
आंसुओ के महासमुद्र मे
एक हिम -शिला की तरह
लगभग पुरा ही
डूबा हुवा हूँ

तुम
अन्नंत भावो से संवरी हुवी अनेक तस्वीर हो
मै
अन्नंत विचारों से बनी हुवी अनेक कविता हूँ
तुम चित्र की भाषा हो
मै उस चित्र -मय भाषा की -कविता हूँ

वह बीज प्यार का अब पौधा बन चुका है
वह चिंगारी -दावा नल बन चुकी है

इस पौधे मे
फूल बहुत है
तुम्हारे जुड़े मे इन फूलो को मै सजाना चाहता हूँ

ट्रेन मे खिड़की के पास
बैठी हुवी तुम्हारी आँखे
घूमते हुवे -इन वन दृश्यों मे
मुझ एक वृक्ष को खोजती है

या मुझ एक शहर को तलाशती है
सारे दृश्य -पेड़ ,नदी ,समुद्र ,शहर ,भीड़ .....
सब गुजर जाते है
लेकी न तुम मुझे दीखती हो
न ही
मै तुम्हे दिखायी देता हूँ

लेकीन फ़िर भी
हम दोनों एक दुसरे के सबसे ज्यादा करीब है

तुम मेरी केन्द्र -बिन्दु हो
और मै वृत्त की परिधि
तुम अन्तिम लक्ष्य मेरा
मै तुम्हारी शुरुवात हूँ
मै सच्ची एक तस्वीर हो
मै एक सच्ची बात हूँ
{a true वर्ड or a true photo
.......needs no oath }

{किशोर }

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